सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला प्रश्न उत्तर | suryakant tripathi nirala question and answer

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

(जीवन परिचय)

जन्म : बंगाल 1898

जीवन-परिचय:- निराला जी के बचपन का नाम सूर्यकुमार था। जब वे केवल तीन
वर्ष के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। किशोरावस्था में उनका विवाह कर दिया गया। पत्नी की प्ररेणा से निराला जी की साहित्य और संगीत में रूचि उत्पन्न हुई। सन् 1918 में उनकी पत्नी मनोहरा देवी परलोक सिधार गई उसके बाद पिता चाचा, चचेरे भाई एक-एक कर सब की मृत्यु हो गई। इतना ही नहीं, इनकी दो सन्तानों (पुत्र और पुत्री) में से पुत्र की भी अल्पायु में मृत्यु हो गई। अन्त में पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु ने निराला जी को तोड़कर रख दिया। निराला जी का पूरा जीवन अभावों व दुखों से ग्रस्त रहा।

शिक्षा : नौवीं कक्षा तक

सम्पादन कार्य:-

1. 1922 रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘समन्वय’ के
सम्पादन मे

2. 1923.24 मतवाला’ के सम्पादक मण्डल में।

रचनाएँ :-

1. काव्य-कृतियाँ : परिमल, गीतिका, अनामिका, बेला, अर्चना, आराधना , नए पत्र आदि।

2. उपन्यास : अप्सरा, अलका, प्रभावती, इरावती, निरूपमा, रतिनाथ की चाची आदि।

3. कहानी संग्रह : लिली, चतुरी चमार, सुकुल की बीबी, सखी, देवी।

4. रेखाचित्र : कुलीभाट

5. निबन्ध संग्रह : प्रबन्ध पदम, प्रबन्ध प्रतिमा, चाबुक, चयन।

6. समीक्षा : रवीन्द्र कविता, काननपंत और पल्लव।

साहित्यिक विशेषताएँ:-

1. प्रेम, प्रकृति-चित्रण और रहस्यवाद
2. भारतीय इतिहास, दर्शन और परम्परा का व्यापक बोध
3. समकालीन जीवन के यथार्थवादी पक्षों का चित्रण
4. राष्ट्रीय चेतना और भारतीय संस्कृति का गंभीर चित्रण
5. भारतीय किसान के जीवन से लगाव

भाषा शैली:-
1. छन्दोबद्ध और छन्द मुक्त कविता
2. तत्सम प्रधान भाषा, खड़ी बोली
3. चित्रात्मक बिम्ब योजना
4. भाषा का कसाव, शब्दों की मितव्ययिता और अर्थ की प्रधानता ।
5. प्रबंध काव्य, मुक्तक और ग्रन्थ- सभी प्रकार की शैलियों का प्रयोग

मृत्यु : 1961 इलाहाबाद

 

( सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला प्रश्न उत्तर. suryakant tripathi nirala question and answer)

प्रश्न 1. अपने बचपन की स्मृतियों को आधार बनाकर एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कीजिए।

उत्तर:- हल्के हरे रंग सी तितली,
एक नहीं असंख्य उड़ी।
मैं उनके मध्य उड़ी,
नहीं उड़ी तो, ले उनको उड़ी
माचिस की डिब्बिया में भर,
कूद-कूद के मैं हूँ उड़ी,
हँसी और उत्साह ह्दय में लेकर
घर के छज्जे में हूँ खड़ी
बहुत सही तुमने पराधीनता,
अब उड़ चलो अपनी नगरी,
मैं यह कहकर उनके साथ उछली।

 

प्रश्न 2. ‘सरोज स्मृति’ पूरी पढ़कर आम आदमी के जीवन-संघर्षों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर:- ‘सरोज स्मृति’ को पढ़कर पता चलता है कि आम आदमी का जीवन कितना कष्ट भरा है। कहीं धन का अभाव है, तो कहीं अपनों के प्रेम की कमी। एक आम आदमी का जीवन घर, कार्यालय, बिजली-पानी-भोजन की व्यवस्था में निकल जाता है। बच्चों की शिक्षा, उनका भविष्य तथा विवाह से संबंधित खर्चों के नीचे वह स्वयं को दबा पाता है। एक घर लेने के लिए उसे एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और यदि वह घर ले लेता है, तो उसे जीवनभर कर्ज का बोझ दबा देता है। ऐसी स्थिति में घर और बच्चों की आवश्यकताओं के लिए वह कोल्हू का बैल बन जाता है। जिनके लिए वह यह सब कर रहा है यदि ईश्वर ही उन्हें अपने पास बुला ले तो मनुष्य का ह्दय चित्कार उठता है। ‘सरोज स्मृति’ आम आदमी के जीवन-संघर्षों का प्रमाण है। कवि अपनी गिरती आर्थिक स्थिति के कारण पिता का कर्तव्य नहीं निभा पाता। मातृविहिन अपनी संतान को अपने से अलग रखता है। यद्यपि उसकी संतान को उसके नाना-नानी का समस्त प्यार-दुलार मिलता है लेकिन यह काफी नहीं है। यदि कवि के जीवन में धन का अभाव नहीं होता, तो वह अपनी संतान को अपने साथ रख पाता तथा उसका विवाह बड़े धूमधाम से कर पाता। अपनी पुत्री का विवाह धन के अभाव में न कर पाने के कारण कवि का हृदय दुखी होता दिखाई देता तथा पत्नी के बाद पुत्री की मृत्यु उसे अंदर तक तोड़ देती है। वह विवश हो उठता है। अपने प्रेम को अपनी संतान के समक्ष रख नहीं पाता और उसकी वेदना से उपजी यह कविता हमारे समक्ष आ खड़ी होती है। हर मनुष्य के जीवन में ऐसे संघर्ष भरे पल विद्यमान होते हैं।

 

प्रश्न 3. सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर:- सरोज का विवाह अन्य विवाहों की तरह चमक-दमक, शोर-शराबे से रहित था। सरोज का विवाह बहुत सादे तरीके से हुआ था। इस विवाह में समस्त रिश्तेदारों, मित्रों तथा पड़ोसियों को नहीं बुलाया गया था बल्कि यह परिवार के कुछ लोगों के मध्य ही संपन्न हुआ था। इसमें संगीत तथा मेहंदी जैसी रस्मों का अभाव था। किसी ने विवाह के गीत नहीं गाए न ही लोगों का ताँता लगा था। बस चारों तरफ़ शांति विराजमान थी। यह विवाह इसी शांति के मध्य हुआ था। माँ के अभाव में कवि ने ही माँ की ज़िम्मेदारी को निभाया तथा उसे कुल संबंधी नसीहतें दीं।

 

प्रश्न 4. शकुंतला के प्रसंग के माध्यम से कवि क्या संकेत करना चाहता है?

उत्तर:- शकुंतला कालिदास की एक पात्र है। जिसने कवि कालिदास की कृति अभिज्ञान शाकुंतलम को लोगों के हृदयों में सदा के लिए अमर कर दिया। शकुंतला ऋषि विश्वामित्र तथा अप्सरा मेनका की पुत्री है। मेनका शकुंतला को जन्म देकर तुरंत स्वर्ग को चली गई। जंगल में अकेली नवजात शिशु को देखकर कण्व ऋषि को दया आ गई और वे इसे अपने साथ ले आए। उन्होंने शकुंतला का लालन-पालन किया तथा पिता तथा माता की समस्त भूमिका निभाई। पुत्री की विदाई में कण्व ने भाव-विभोर होकर विलाप किया। शकुंतला की भांति ही सरोज की माता उसके बाल्यकाल में ही चल बसी। उसका लालन-पालन उसके ननिहाल में किया गया। वह बच्ची माता-पिता के प्रेम से वंचित रही। कण्व ऋषि के समान सूर्यकांत निराला जी ने सरोज के सयाने होने पर उसका विवाह कर दिया। सरोज की विदाई में निराला जी ने बहुत विलाप किया तथा मातृत्व के समस्त कर्तव्य निभाए। अत: निराला जी शकुंतला के माध्यम से अपनी पुत्री सरोज की ओर संकेत करते हैं।

 

प्रश्न 5. ‘वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली’ पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?

उत्तर:- कवि निराला जी इस पंक्ति के माध्यम से सरोज के लालन-पालन के प्रसंग को उद्घटित करते हैं। उनकी पत्नी मनोहारी जी के निधन के बाद उनकी पुत्री का लालन-पालन उनके नाना-नानी के द्वारा किया गया था। पहले मनोहारी लता रूप में वहाँ विकसित हुई अर्थात मनोहारी जी का जन्म वहाँ हुआ और अपने माता-पिता की देख-रेख में बड़ी हुई। लता जब बड़ी हुई, तब तुम उस लता में कली के समान खिली अर्थात मनोहारी जी की संतान के रूप में सरोज ने जन्म लिया। परन्तु माँ की अकस्मात मृत्यु के बाद नाना-नानी की देख-रेख में युवावस्था को प्राप्त होकर एक युवती बनी। नाना-नानी के पास ही तुम्हारा समस्त बाल्यकाल बीता तथा वहीं तुमने युवावस्था में प्रवेश किया था।

 

प्रश्न 6. कवि ने अपनी पुत्री का तर्पण किस प्रकार किया?

उत्तर:- कवि अपनी पुत्री सरोज से बहुत प्रेम करता है। वह चाहता है कि मृत्यु के बाद का उसका समय कष्टपूर्ण न बीते। अत: वह उसकी सद्गति के लिए अपने सपूर्ण जीवन में कमाएँ गए सद्कर्मों को पुत्री के तर्पण करते समय अर्पित कर देते हैं। हिन्दू धर्म में श्राद्ध के समय तर्पण देने का रिवाज है। इस समय जल तथा अन्य सामग्री के साथ मरे व्यक्ति का तर्पण किया जाता है। कवि इसी समय अपनी पुत्री के लिए अपने सद्कर्मों रूपी भेंट अर्पित करता है। इस प्रकार एक पिता अपनी पुत्री को श्रद्धांजलि देता है।

प्रश्न 7. निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए-

(क) नत नयनों से लोक उतर

(ख) श्रृंगार रहा जो निराकार

(ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला

(घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ

उत्तर:- (क) कवि के अनुसार उसकी पुत्री विवाह के समय बहुत प्रसन्न है। नववधू बनी उसकी पुत्री की आँखें लज्जा तथा संकोच के कारण चमक रही है। कुछ समय पश्चात यह चमक आँखों से उतर कर उसके अधरों तक जा पहुँच जाती है।

(ख) इसका अर्थ है; ऐसा श्रृंगार जो बिना आकार के हो। कवि के अनुसार इस प्रकार का श्रृंगार ही रचनाओं में अपना प्रभाव छोड़ पाता है। कवि ने अपने द्वारा लिखी श्रृंगार रचनाओं में जिस सौंदर्य को अभिव्यक्त किया था, वह उन्हें नववधू बनी पुत्री के सौंदर्य में साकार होता दिखाई दिया।

(ग) इस पंक्ति में कवि को अपनी पुत्री को देखकर अभिज्ञान शकुंतलम् रचना की नायिका शकुंतला का ध्यान आ जाता है। उनकी पुत्री सरोज का माता विहिन होना, पिता द्वारा लालन-पालन करना तथा विवाह में माता के स्थान पर पिता द्वारा माता के कर्तव्यों का निर्वाह करना शकुंतला से मिलता है। परन्तु उसका व्यवहार और शिक्षा में सरोज शकुंतला से बहुत अधिक अलग थी। अत: वह कहता है यह पाठ अलग है परन्तु कहीं पर यह मिलता है और कहीं अन्य विषयों पर यह बिलकुल अलग हो जाता है।

(घ) प्रस्तुत पंक्ति में कवि अपने पिता धर्म को निभाने के लिए दृढ़ निश्चयी है। वह अपने पिता धर्म का पालन सदा माथा झुकाए करना चाहता है।

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