Top 10 Horror Story in Hindi 2020 | Horror Story in Hindi

Horror Story in Hindi

1. खंडहर – Horror Story in Hindi

बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज का स्टूडेंट था| अपने कॉलेज की ओर से हम सभी कैम्प के लिए एक जंगल में गए थे| ,

 हलकी ठंढ थी ; अत: रात में हम सबने पूरी रात कैम्प – फायर के साथ डांस करने ,गाने आदि का प्रोग्राम तय किया|

 मुझे और सभी साथियों को कैम्प फायर के लिए लकडियाँ इकट्ठी करने का भार सौंपा गया|

 मैं निकला तो सबके साथ ही लेकिन जंगल के प्राकृतिक सौन्दर्य में भटकता हुआ अकेले बहुत दूर कहीं निकल गया|

 अचानक आसमान बादलों से भर गया और गरज के साथ बारिश होने लगी|

 बादलों के लगातार गरजने से मैं पेड़ के नीचे खड़ा रहना मुनासिब न समझ आसपास किसी घर की तलाश में एक दिशा में भागने लगा|

मुझे कुछ ही दूरी पर एक लाल ईंटों से बनी शानदार बिल्डिंग नजर आई| ,

 बिल्डिंग रोशनी से पूरी नहाई हुई थी और उसमें ढेर सारे लोग हैं – ऐसा दूर से ही लग रहा था|

 मैं तेजी से भागते हुए उस बिल्डिंग में जा घुसा और सामने से आती हुई एक खुबसूरत नर्स से टकराते – टकराते बचा|

 नर्स ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा – “ बहुत अधिक भीग गए हो ,सर्दी लग जायेगी|

 उधर बाईं ओर एक स्टोर रूम है ; वहां जाकर जो भी मिले उससे कहना सिस्टर जूलिया ने दुसरे सूखे और साफ़ कपडे मुझे देने को कहा है – वह तुम्हे कपडे दे देगा| “

 मैं हक्का – बक्का मुंह फाड़े सिस्टर जूलिया को देखता रहा| मुझे एकदम से यह समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ|

 मेरी स्थिति देखकर सिस्टर जूलिया खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली –

 “पहले तो तुम अपना मुंह बंद करो वरना मुंह में मच्छड घुस जायेंगे और अब जाकर वीसा ही करो जैसा मैं ने कहा है|”

 मैं हलके से ‘हाँ ‘ में सर हिला सिस्टर की बताई दिशा में जाने को मुद गया|

अभी कुछेक दस कदम ही चला होउंगा कि मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा|

 मैं चौंककर पीछे मुदा और अपने सामने आर्मी की वर्दी में एक युवक को खडा मुस्कुराता पाया|

 मेरे चेहरे पर आश्चर्य का बादल अपना घर बना चुका था ; जिसे देखते ही उस युवक को हंसी आ गई|

 उसने धीमे ,किन्तु दृढ स्वर में कहा – “ मैं कैप्टन विनोद हूँ और यह हमारे देश की आर्मी का हॉस्पिटल है|’

 कैप्टन विनोद की बातों ने मुझे आश्वस्त किया|

 मैं अब धीरे – धीरे सामान्य हो गया और मैं ने कैप्टन विनोद को सिस्टर जूलिया की कही बातें बताई|

 सुनकर ,कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान फ़ैल गई और वे बोले – “ तो सिसितर जूलिया से भी मिल चुके|”

 “ जी , क्या मतलब है आपका ?”

 “ कुछ नहीं ,चलो मैं तुम्हे सूखे कपडे देता हूँ चेंज कर लो नहीं तो सच में सर्दी लग जायेगी|”

 और मैं कैप्टन विनोद के पीछे – पीछे एक बड़े से कमरे में पहुँच गया| कमरे के चारो ओर हरे रंग के परदे लगे हुए थे| ,

 एक ओर एक बड़ा सा बेड पडा हुआ था और उसके सामने एक सोफा था|

 बीच में एक टेबल था जिस पर दो ग्लास ,एक बड़ी बोतल ब्रांडी की और एक या दो पत्रिकाएं पड़ी हुई थीं|

कमरे के एक कोने में एक बड़ी सी अलमारी थी ;जिसमें से कैप्टन विनोद ने एक आसमानी रंग का कुरता – पायजामा निकालकर मुझे दिया और कमरे से लगे बाथरूम की ओर इशारा किया|

 मैं बाथरूम से कपडे चेंज कर जैसे ही निकलने लगा मेरी नजर बाथरूम की एक दीवाल पर पड़ी|

 वह खून के छींटों से भारी हुई थी| यह देखकर मैं घबडा गया और जल्दी से बाहर निकलने को मुदा कि बाथरूम में लगे आईने में खुद को ही देखकर चौंक गया|

 आईने में मेरा पूरा शरीर तो नजर आ रहा था लेकिन मेरे शरीर पर से मेरा सर गायब था|

 अब मुझे डर लगने लगा और मैं हडबडा कर बाथरूम से निकल गया| ,

 मुझे इस तरह बाहर निकलते देख कैप्टन विनोद ने हंसकर पूछा – “ क्या हुआ ? अरे हाँ ,तुम ने तो अब तक मुझे अपना नाम ही नहीं बताया|”

 “ कहाँ जाओगे ,बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है| लेकिन ,तुम जाना क्यों चाहने लगे अचानक यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ|”

 “ कैप्टन विनोद आपकी बाथरूम की एक दीवाल पूरी खून के छींटों से भरी हुई है| और और आपके बाथरूम में लगा आईना भी कुछ अजीब सा है|

 उसमें मुझे मेरा पूरा शरीर तो दिखाई दिया लेकिन मेरा सर ही गायब था| मैं अब बिलकुल भी नहीं रुकुंगा यहाँ|

 बारिश में ही भीगता हुआ अपने कैम्प तक जाऊँगा|”

 कहते हुए मैं कमरे से बाहर जाने वाले दरवाजे की ओर बढ़ा|

 “ रुको “ तभी कैप्टन विनोद की कडकती आवाज गूंजी “ तो तुमने सबकुछ देख ही लिया|”

 “जी क्या मतलब है आपका ?” मेरी आवाज में डर भर गया था|

 “ मतलब चाहे जो हो|तुम तब तक यहाँ से नहीं जा सकते जबतक मैं तुम्हे कुछ बता न दूं|”

 “ क्क्कक्या बताना चाहते हैं आप ?”

“ जो आजतक कोई न जान सका|”

 “ जो आज तक कोई न जान सका वह मैं जानकार क्या करूंगा| प्लीज ,अब मुझे जाने दें|” – मैं डर से रुआंसा हो गया|

 “नहीं , बिलकुल भी नहीं| और , तुम्हे मुझसे डरने की भी कोई जरुरत नहीं|

 सैनिक सबकी रक्षा के लिए होते हैं| मैं भी तुम्हारी सुरक्षा ही कर रहा हूँ|” – कैप्टन विनोद के स्वर में कोमलता थी – “ आओ मेरे साथ इस सोफे पर बैठ जाओ|

 मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ| कहानी खत्म होते ही मैं तुम्हे तुम्हारे कैम्प तक जीप से छोड़ आऊंगा|

 वैसे भी तुम अपने साथियों से काफी आगे निकल आये हो|वहां तक तुम अब चलते हुए शायद पहुँच न पाओ|”

 कैप्टन विनोद के स्वर में जाने कैसी आश्वस्ति थी मैं जाकर उनके बगल में बैठ गया|

 कैप्टन विनोद ने कहना शुरू किया – “दुश्मनों ने धोखे से हमारे अस्पताल को अपना निशाना बनाया|

 दुश्मन देश के दो सैनिक हमारे सैनिक के वेश में एक हमारे ही घायल सैनिक को लेकर आये|

 वह घायल था और और हमारे देश की सेना ने उसे बहुत ढूंढा लेकिन नहीं मिला था|

 शायद , साजिश के तहत उसे घायल होते ही घुसपैठियों ने कहीं छुपा दिया था|

 अचानक अपने खोये सैनिक को अपने हॉस्पिटल में पा सभी खुश हो गए और बिना अधिक पड़ताल किये हॉस्पिटल के गेस्ट रूम में घायल को लेकर आने वाले छद्म वेष धारियों को ठहरने की इजाजत दे दी गई|

 अभी उस सैनिक का इलाज चल ही रहा था कि जोरों का ब्लास्ट हुआ और पूरा हॉस्पिटल एक पल में खंडहर में तब्दील हो गया|”

 “ लेकिन हॉस्पिटल तो अपनी शानदार स्थिति में खडा है| “

 मेरी बातों को अनसुना कर कैप्टन विनोद ने अपनी बात जारी रखी – “ कोई नहीं बचा उस ब्लास्ट में|

 दीवाल पर पड़े खून के छींटे भी उसी ब्लास्ट में मारे गए होपितल के कर्मचारियों के हैं|”

 “ हाँ , पर यह होस्पीटल तो मुझे खंडहर नहीं दिखता|”

 जवाब में कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्य भरी मुस्कान फ़ैल गई और उनका चेरा अजीब से भावों से भर गया|

 मैं उनके चेहरे को देखकर अन्दर से दहल गया| फिर भी , मैं ने हिम्मत कर पूछा – “ आप उस ब्लास्ट में बाख कैसे गए ?”

 सुनते ही कैप्टन विनोद ठहाका लगा कर हंस पड़े और मुझ पर एक भरपूर नजर डालते हुए कहा – “ यह कहानी आज से मात्र दस वर्ष पहले की है और मैं तो आज से पचास वर्ष पहले मर चुका हूँ|”

 इसके आगे उनहोंने क्या कहा – मुझे कुछ नहीं मालुम|,

 चेहरे पर गीलेपन का अहसास जब काफी हुआ तो मैं जैसे नींद से जागा| मुझे घेरे हुए मेरे सभी सहपाठी और टीचर खड़े थे|

 मेरे आँख खोलते ही मेरे सर ने कहा – “ थैंक गॉड ! तुम्हे होश आ गया|”

“ तो क्या मैं बेहोश था ?”

“ हाँ , तुन जंगल में जाने कहाँ भटक गए थे|

 जब सभी लौट आये और तुम नहीं आये तो हम सभी मिलकर तुम्हें ढूँढने निकले|

 काफी दूर जाने के बाद हमने एक जीप आती दिखाई दी जिसमें एक आर्मी मैन तुम्हे पीछे की सीट पर सुलाए हुए हमारे कैम्प को ढूंढते हुए आ रहे थे|

 उनहोंने हम सबको भी अपनी जीप पर बिठाया और कैम्प तक्ल छोड़ा|

हमने उन्हें काफी रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कहते हुए चले गए अभी नहीं रुक सकता एक जरुरी काम है|”

 जब हमने तुम्हारे बेहोश जाने और उन तक तुम्हारे पहुँचने के बारे में पूछा तो बोले – “ सोमेश ही बताएगा और जो भी बताएगा वह सब अक्षरश: सच होगा|

 सबकी उत्सुक निगाहें अपनी ओर लगी देख मैं ने धीमे स्वर में पूछा — + क्या उनका नाम कैप्टन विनोद था ?”

 सर ने “ हाँ “ में सर हिलाया|

 मैं ने सबको उधर चलने को कहा जिधर से सबने जीप आती देखी थी|

 पहले तो सर तैयार नहीं हुए लेकिन मेरे बहुत कहने पर वे राजी हो गए| सुबह होते ही हम उधर की ओर गए|

 मैं उस जगह पर पहुँच कर गहरे आश्चर्य में डूब गया| वहां एक अधजला खंडहर था : जिसके एक टूटे पत्थर पर लिखा था “ आर्मी हॉस्पिटल “| Horror in Hindi

2. तंत्रा – Horror Story in Hindi 2020

मुकेश और मैं एक ही कंपनी में काम किया करते थे। एक रोज हमें ट्रेनिंग पर भेज दिया गया। हमारी इससे पहले औपचारिक बातें ही हुआ करती थी।

पर ट्रेनिंग पर हमें एक दूसरे को जानने का मौका मिला। हमें कमरे में एक साथ ही रूकना था। साथ रहकर हम आपस में काफी घुल मिल गए थे। ,

अक्सर रात को मुझ पर से चादर हट जाती तो मुकेश मुझे चादर ओढ़ा दिया करता था। मैंने उससे पूछा,’’क्यो जागते रहते हो रात भर।

 मेरी तो आदत है करवट बदल-बदल कर सोने की चादर तो टिकती ही नहीं‘‘।

 मुकेश ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। अगले दिन वो कुछ शांत नजर आने लगा।

 रात को सोते समय मुकेश ने जो मुझे बताया वो न केवल दिलचस्प था बल्कि कुछ ऐसा था जो मैंने ना तो कभी सुना ना ही कभी महसूस किया।

 ऐसा कम ही देखने को मिलता है। बात केवल विश्वास की रह जाती है।

 मुकेश ने कहना शुरू किया।

 आप शायद यकीन ना करें 2003 का साल था। टीवी देखना, लाइब्रेरी जाना, दोस्तों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या बनी हुई थी।

 ऐसे में एक दिन मैं अपने दोस्त से मिलने उसके घर गया हुआ था। पता चला मेरे छोटे भाई दिनेश की तबियत खराब है।

 मैं तुरंत घर को निकल पड़ा। वहॉँ देखा परिवार के सभी लोग मौजूद हैं। दिनेश जोरों से चींख रहा है, जैसे उसे किसी तरह का दर्द हो रहा हो।

 उसकी हालत बिल्कुल भी देखने लायक नहीं थी। तीन चार लोग भी मिलकर उसे संभाल नहीं पा रहे थे।

 पिताजी ने कहा इसे तुरंत डॉक्टर के पास ले चलते हैं।

 पर माँ ने मुझे चुप रहने का इशारा किया। दिनेश चींखता और बेहोश हो जाता।

 दिनेश की चीखें अब भयानक होने लगी थी। कोई उसका सर दबा रहा था कोई उसकी छाती मल रहा था।

 नानी ने कहा इसे पूजाघर में ले चलो। इतना सुनते ही दिनेश जोरों से चीखा। शायद ये बात उसे पसंद नहीं आयी।

 उसे घसीट कर पूजाघर में लाना पड़ा। यहॉँ वो और भी जोरों से चीखने लगा। उसे संभालना मुश्किल हो रहा था तो हमने उसे कुर्सी से बांध दिया। ,

 फिर नानी ने उससे प्रश्न किया, ‘‘बता कौन है तू’’?

 सुनकर दिनेश गुस्से में भर गया। उसका सर और छाती अब भटटी की तरह तपने लगे। उसे अब संभालना मुश्किल हो रहा था। नानी ने फिर कहा, ’’बता कौन है तू‘‘?

 इस बार दिनेश ने गुस्से में अपने दांत पीस लिए। उन दांतों को किटकिटाने की आवाज मेरे कानों में दर्द करने लगी थी।

 उसके बदन की सारी हडिडयॉ कड़क रही थी। ,

 आखिर में उसने अपनी जबान बाहर निकाली जो काली पड़ चुकी थी। यकीन नहीं हो रहा था किसी इंसान की जबान खिंच कर इतनी लंबी हो सकती है।

 नानी ने फिर अपनी बात को दोहराया ’’बता कौन है तू‘‘? कहॉ से आया है ?

 इस बच्चे ने तेरा क्या बिगाड़ा है? जहाँ से भी तुम आये हो वहीं लौट जाओ। बदले में जो कुछ भी मांगोगे हम तुम्हें देंगे। लेकिन इस बच्चे को छोड़ दो‘‘।

 दिनेश ने अपना आपा खो दिया। वो उसी तरह कराहता, दांत पीसता, चींखता चिल्लाता और बेहोश हो जाता।

 होश में आने पर उसे संभालना मुश्किल हो जाता था। मुझसे यह सब देखा नहीं गया। मैं बाहर आ गया और रोने लगा।

 उस वक्त मैंने हनुमानजी को याद किया। मंदिर में दिया भी जलाया। रोते-रोते भगवान से दिनेश के ठीक होने की प्रार्थना की।

 और वापस दिनेश के पास आ गया। दिनेश के रोने-चीखने से वहॉ अब जमघट लग चुका था।

 लोगो की भीड़ में भी दिनेश उसी तरह की हरकतें किये जा रहा था।

 उसके शांत होने पर मैंने उसे पानी पिलाया। पानी पीने के बाद वो और भी भयानक रूप में आ गया।

 उसका चेहरा एक दम काला हो गया, आंँखे लाल सुर्ख हो गई। यह वो दिनेश नहीं था जिसे मैं पहचानता था। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आंँखे फट कर बाहर आ जायेगी। ,

 पास जाने पर वो हर किसी को काटने को दौड़ता। अपना मुँह नोचने लगता। और फिर वो शांत हो गया और रोने लगा।

 मैंने पूछा तुम कौन हो? क्यों हमें परेशान कर रहे हो?

 दिनेश ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मेरी जान ले लेगा। दिनेश कुछ देर तक मुझे घूरता रहा। वो दिनेश नहीं था उसकी जगह किसी और ने ले ली थी।

 सबको बारी बारी घूरने के बाद उसकी आँखें अपने कोटर में गोल गोल घूमने लगी।

ऐसा नजारा जीवन में पहली बार ही देख रहा था। बल्कि मैं तो कहूंगा यह सब कुछ जीवन में पहली बार ही देख रहा था।

 वो चींखना चिल्लाना वो भयानक सी हँंसी, वो दांत पीसना किटकिटाना, दर्द में कराहना, हडिडयों का एक साथ कड़कना, सब कुछ एक मनहूसियत में बदल चुका था।

 फिर दिनेश ने एक लंबी सांस खींची और छोड़ी। उसकी सांस की दुर्गन्ध इतनी थी सब अपना मुंह ढ़क कर घर से बाहर निकल गए।

 और वो पागलों की तरह हंँसा। वापस अंदर जाने पर दिनेश फिर सभी को घूरने लगा। हमने वापस उससे पूछा, ’’कौन हो तुम‘‘?

 फिर वो एक औरत की आवाज में बोला, ‘‘मैं शाहडोल की हूॅ। मैं हूँ तंत्रा। इसने मुझे जगा दिया है। मैं इसे नहीं छोडूंगी। इसे अपने साथ लेकर जाउंगी’’। और हंसने लगी।

 हमने कहा जो तुम मांगोगी हम तुम्हें देंगें पर इसे छोड़ दो।

 वो दुष्ट आत्मा अब अपने पूरे रूप में आ गई और बोली, ‘‘मुझे एक मटकी, चार नारियल, चुनरी, सिंगार का पूरा सामान लाकर दो तो मैं चली जाउँगी।

 नहीं तो इसे अपने साथ ही लेकर जाउँगी।

 जल्दी करो। जल्दी करो दफा हो जाओ। ये सामान लेकर ही आना। वरना इसे तो मैं चबा जाउंगी’’। और हंसने लगी

 हम सबके चेहरे पीले पड़ गये। माँ और मैं तेजी से बाजार की तरफ निकले। रास्ते में मॉ रोने लगी तो मैंने उन्हें दिलासा दी ‘‘सब ठीक हो जाएगा’’ माँ

 माँ बोली कुछ भी ठीक नहीं होने वाला मुकेश। मैंने तुझे बताया नहीं। इसने जब अपना पहला असर दिखाया था। तब दिनेश को क्या हुआ हम समझ ही नहीं पाये थे।

 दिनेश के साथियों ने हमें बताया। उस दिन दिनेश के ऑफिस में मीटिंग थी। सब आपस में हंस-बोल रहे थे।

 सब कुछ ठीक था कि अचानक दिनेश की तबियत बिगड़ने लगी। दिनेश ने सामने रखा गिलास उठाया और पानी पिया। पानी पीते ही दिनेश बेहोश हो गया।

 उसके साथी चौंक गये। दो लोगों ने मिलकर उसे टेबल पर लिटाया। उस समय उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

 वो अपनी साथियों से कुछ कहना चाह रहा था लेकिन उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था। उसके साथी उसे हॉस्पिटल ले गए।

 हमें जैसे ही सूचना मिली हम सभी वहॉ पहुंच गए। दिनेश कुछ देर बाद दिनेश ठीक हो गया। क्या हुआ उसे खुद भी कुछ मालूम नहीं था।

 उसे इतना याद था कि वो बेहोश हो गया था। उसके बाद कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे कोई परेशानी हो।

 ‘‘तुम ठीक कह रही हो मॉ उसके बाद भी कुछ हुआ जरूर था’’

 क्या मतलब? मॉ बोली।

 मतलब ये माँ पिछली बार जब मैं छुटिटयों में घर आया था। उस रात मैं कमरे में सो रहा था।

 रात के तीन बजे का समय था। कमरे की खिड़की खुली हुई थी और उससे तेज हवा कमरे में आ रही थी।

 उस हवा के शोर से मेरी आंँख खुली। मैंने देखा एक साया मेरे पास खड़ा था। ध्यान से देखने पर भी मैं उसका चेहरा ना देख पाया।

 उसके चेहरे पर कालिख के आलावा कुछ ना था। उसका शरीर धुँंए जैसा था। अचानक वो सांया बादल की तरह तैरता मेरे पास आने लगा।

  मैं घबरा गया और अपनी चादर में मैंने अपने आप को समेट लिया। वापस देखा तो वो साया वहाँ नहीं था।

 इसे अपना वहम मानकर मैं भूल चुका था। पर अब दिनेश के हालात देख कर लगता है कुछ तो जरूर हुआ है मॉँ।

 इसके बाद मैं मटकी लेने चला गया और माँं सिंगार के लिए सामान खरीदने लगी। मुझे दुकाने बंद मिली तो मैं सीधे कुम्हार के घर चला गया।

 वहॉ से लाल और काली दोनों मटकी ले आया। वापस आकर ज्यों ही सामान हमने दिनेश के आगे रखा वो शांत हो गया।

 नानी उसे देखने गई और दिनेश के सामने जाकर खड़ी हो गई। कुछ देर तक नानी उसे ऐसे ही देखती रही तो हमने नानी से पूछा क्या हुआ नानी? नानी हमारी ओर पलटी।

 अब नानी के चेहरे के भाव दिनेश जैसे हो गए थे। हम और भी घबरा गये।

 नानी ने भी उसी चींख के साथ रोना शुरू कर दिया और कहा, ‘‘ मैं शाहडोल की हूॅ। मेरी हत्या कर दी गई थी।

 मेरी लाश के बेरहमी से टुकडे़ टुकडे़ करके दफन कर दिया गया। मुझे इंसाफ चाहिए।

  मुझे जहॉ गाड़ा गया वहॉ ये लड़का पेशाब कर आया। मैं सोई हुई थी इसने मेरा अपमान किया और मुझे जगा दिया। पर अब मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं जा रही हॅू। मुझे रास्ता दो।

 हमने पूछा तुम इसे दोबारा परेशान नहीं करोगी। वो बोली नहीं इसने मेरा अपमान किया जिसकी सजा मैंने दे दी। अब मुझे जाने दो।

 और नानी बेहोश होकर गिर गई। हमने नानी को संभाला। इतनी देर में दिनेश भी सामान्य हो चुका था। हमने दिनेश को भी कुर्सी से खोल दिया।

 फिर कुछ दिन और बीते दिनेश को काम के लिए भोपाल जाना पड़ा। दिनेश और ऑफिस के कुछ लोगा होटल में रूके। ,

 होटल में आधी रात को लोगो ने शिकायत की वहॉ कमने से रोने की आवाजें आ रही हैं। होटल कर्मी ने जाकर देखा तो वो आवाजें दिनेश के कमरे से आ रही थी।

 कमरा अंदर से बंद था। तो होटल कर्मी ने दूसरी चाबी से कमरे का दरवाजा खोला।,

 सामने दिनेश था होटल की चादर में पूरा लिपटा हुआ और जमीन से दो फुट उपर हवा में उसका शरीर तैर रहा था।

 उसके मुंह से अजीब अजीब आवाजें आ रही थी। इस भयानक नजारे को देख कर उन लोगों के दिल दहल गये। कुछ लोग तो भाग खडे हुए। ,

 बाकी लोगो ने दिनेश को पकड़ा तो वो चींख पड़ा और चिल्लाने लगा। लोगों ने पुलिस को फोन कर दिया।

 शांतिभंग के आरोप में पुलिस दिनेश को ले गई। उसके साथियों ने उसे छुड़ाया।

 उसके बाद दिनेश का लगातार यही हाल रहा। किसी ने मांडल के जंगलों में एक तांत्रिक होने की बात हमें बताई। शायद वो दिनेश को ठीक कर सके।

 हमने उसे बुलाया। उस तांत्रिक ने भी आत्मा से बातें की तो उसकी वही मांग शुरू हो गई। मटकी, चार नारियल, चुनरी और सिंगार का सामान।

 अभी तक याद है मुझे वो किस तरह अपनी मांगे दोहराती थी। इन सबके साथ उसने शराब भी मांगी।

 रात के समय शराब कहीं भी नहीं मिली। मैं भागा भागा अपने मौहल्ले की उन गलियों में गया जहॉ से मुझे गुजरना भी गंवारा नहीं था।

 पर भाई की सलामती के लिए भी उन गलियों में गया जहॉ अक्सर लोग नशे में धुत्त पडे़ रहते थे। शराब की दुर्गंध के कारण दिन में भी उस गली से कोई नहीं गुजरता था।

 वहॉ जाकर मैंने उन लोगों से शराब मांगी तो उन्होंने कहा क्या आज तू भी पियेगा आजा आजा बैठ यहॉ आज तू बेटा सारे गम भूल जायेगा।

 मैं गम भुलाने नहीं आया हूॅ। मेरे भाई की तबियत खराब है उस पर उपरी साया है।

 तांत्रिक शराब से पूजा करेगा। यह सब जानने के बाद उन्होंने अपनी शराब की बोतल मुझे दे दी। जिसे लेकर मैं लौट आया। इसके बाद शराबियों से मेरी नफरत कम हो गई।

 तांत्रिक ने पूजा शुरू की। रात भर तांत्रिक पूजा करता रहा। दिनेश कभी चींखता, कभी चिल्लाता, कभी दर्द में कराहता, कभी गुस्से में तांत्रिक को गालियां देता, कभी मुझे घूरता, कभी तांत्रिक को घूरता। ,

 तांत्रिक का उस पर कोई ध्यान नहीं था। वो एक दाना गेंहूॅ का लेता कुछ मंत्र पढता और उस दाने को दिनेश पर फेंक देता।

 उस दाने के शरीर पर पड़ते ही दिनेश बुरी तरह तड़पने लगता।

 उसके मुंह से जानवरों के जैसे गुर्रराने की आवाजें निकल रही थी। वो जानवरों की तरह हरकत करने लगा था।

 दिनेश की आवाज उसके गले में ही बंध कर रह गई थी । वो क्या बोल रहा था कुछ समझ नहीं आ रहा था।

 सुबह तक दिनेश ठीक हो गया और बेहोश रहा। शायद इन सबसे उसका शरीर थकने लगा था। उसका चेहरा पीला पड़ने लगा था।

 शरीर सूख कर लकड़ी जैसा हो चला था। फिर भी कहीं ना कहीं मेरा भाई इन बुरी शक्तियों से लड़ रहा था मुझे यकीन था।

 कुछ दिन और बीतने पर दिवाली को त्यौहार आ गया था। धनतेरस का दिन था और मैं टीवी देख रहा था।

 दिनेश कमरे में आया और बेहोश हो गया। मुझे लगा वापिस वही सब शुरू होने वाला है तो मैंने उसे कुर्सी से बांध दिया।

 दिनेश थोड़ा होश में आया और उस आधी बेहोशी की हालता में उसने मुझसे कहा, भाई अब मैं नहीं बचूंगा, मैं खत्म हो जाउंगा।

 ये सुन कर मेरी आंखों से आंँसू आ गये। मैं अपने भाई को इस तरह जिंदगी से हारते नहीं देखना चाहता था।

 दिनेश भी रो रहा था ’’भाई मैं मर जाउगा‘‘। मैने खुद को संभाला और दिनेश को बाँध दिया। बाइक ली और एक दोस्त को साथ लेकर मै उसी तांत्रिक को बुलाने निकला।

 मांडल के घनघोर जंगल घुप्प अंधेरा। मैं तांत्रिक के घर पहुॅँचा। तांत्रिक भी उस दिन शराब के नशे में था। उसे बाइक पर बीच में बैठा कर ले आये।

 तांत्रिक का खुद का शरीर बस में नहीं था। गिरता-पड़ता वो दिनेश के पास पहुॅँचा।

 जैसे ही उसने दिनेश का हाथ पकड़ा उस तांत्रिक का सारा नशा उतर गया। उसने वही पूजा दोहराई और सुबह होने तक दिनेश फिर ठीक हो गया।

 अब तो यही सिलसिला चालू हो गया था। तांत्रिक आता पूजा करता और सुबह तक चला जाता। मटकी, चार नारियल, चुनरी और सिंगार का सामान हमारी रोज की जरूरत बन गयी।

 ये सब चीजें अब घर में हर समय मौजूद रहने लगी। रोज रात घिरते घर में मनहूसियत-सी छा जाती। घर के एक कोने में शराब की बोतलों का ढेर इक्ट्ठा हो गया था।

 ऐसा कोई मंदिर नहीं बचा, कोई मस्जिद नहीं बची जहाँ दिनेश का इलाज नहीं करवाया। अंत में किसी ने कलकत्ता के काली मंदिर जाने का सुझाव दिया। ,

 वहाँ जाकर दिनेश का इलाज कराया। यहॉ भी उसकी वही मांग जारी थी। मटकी चार नारियल चुनरी और सिंगार के सामान की। ,

 पर पुजारी ने साथ साथ कुछ नीबू लौंग और कफन भी मंगवा लिया। इस बार की पूजा मुझे कुछ विशेष लगी।

 पुजारी हर बार कुछ मंत्र पढ़ता और उसे नींबू में फूंक देता और उसमें लौंग चुभा देता। फिर उस नीबू को कफन में लपेट कर एक मटकी में डाल देता।

 दिनेश को इससे बहुत दर्द होता और वो बेहोश हो जाता। होश में आकर दिनेश की फिर वही हरकतें चालू हो जाती थी।

 पर पुजारी अपने काम में लगा रहा। जैसे ही उस आत्मा की बारी आई वो कहने लगी ’’मुझे छोड़ दो । मुझे छोड़ दो। जाने दो मुझे‘‘।

 पुजारीः ’’बोल तू इसे फिर परेशान करेगी‘‘।

 ’’नहीं करूंँगी। नहीं करूंँगी। मुझे माफ कर दो मुझे जाने दो‘‘।

 पुजारी : ’’क्यों परेशान कर रही है इस बच्चे को। पीछा छोड़ इस बच्चे का। वापस जा‘‘। लौट जा जहाँ से भी तू आई है‘‘।

 पुजारी ने ऐसा आठ से दस बार किया और तंत्रा को भी उसने कैद कर लिया। अंत में पुजारी ने वो मटकी हमें दी और कहा, ’’इस बच्चे के अंदर दुष्ट आत्माओं ने डेरा जमा लिया था।

 सारी आत्माओं को इस मटकी में कैद कर दिया है। इसे ले जाकर शमशान में गाड दो और ध्यान रहे नंगे पैर ही जाना‘‘।

 हम उस मटकी को शमशान गाड़ आये। ताज्जुब तो यह था पूरा रास्ता जंगल होकर गुजरता था। रास्ते में नगे पैरों पर एक भी कांटा ना चुभा। ऐसा लग रहा था जैसे रूई पर चलकर हम उस जगह तक पहुंचे थे।

 इसके बाद दिनेश ठीक तो हो गया पर काफी कमजोर हो चला था। केवल खाने और दवाईयों के लिए ही बिस्तर से उठ पाता था। ,

 इस वाकिये के बाद मेरा उन चीजों पर भी विश्वास हो गया जिन्हें मैं पहले नहीं मानता था। पांच सालों तक इस मुसीबत को झेलने के बाद हमारी माली हालत खराब हो गई थी।

 सर पर कर्जा हो गया था। धीरे-धीरे हम भाईयों ने वो कर्जा भी चुका दिया।

 हम कई और दिनों तक दिनेश की देखभाल में रात भर जागते थे। मैं उसके खाने का समय पर दवाईयों का ध्यान रखता था।

 रात में उठ-उठकर मैं देखता था दिनेश सो रहा है या नहीं। उसकी चादर ठीक कर देता था ताकि वो आराम से सो सके। आज भी मेरी यही आदत है।

 बस यही बात थी ऐसा कहकर मुकेश चुप हो गया।

 इस कहानी को ध्यान से सुनने के बाद अंत में मैंने मुकेश से कहा, ’’बेशक यह कहानी किसी के लिए बेमिसाल हो या ना हो लेकिन तुम दोनों भाईयों का आपसी प्यार बेमिसाल है। Horror Story in Hindi 2020

3. अच्छा भूत – Horror Story Hindi

कुफरी में स्कीइंग का लुफ्त उठाने और पूरा दिन मौज मस्ती करने के पश्चात कुमार, कामना, प्रशान्त और पायल शाम को शिमला की ओर बीएमडब्लू में जा रहे थे।,

 सर्दियों के दिन, जनवरी का महीना, शाम के छ: बजे ही गहरी रात हो गई थी।

 गोल घुमावदार रास्तों में अंधकार को चीरती, पेडों के झुरमुठ के बीच कार चलती जा रही थी।

 सैलानी ही इस समय सडकों पर कार चलाते नजर आ रहे थे। टूरिस्ट टैक्सियां भी वापिस शिमला जा रही थी।

 कुफरी की ओर इक्का दुक्का कारें ही जा रही थी। बातों के बीच चारों शिमला की ओर बढ रहे थे। लगभग आधा सफर कट गया था

 कार स्टीरियो की तेज आवाज में हंसी ठिठोली करते हुए सफर का आनन्द उठाते हुए समय का पता नही चल रहा था।

 झटके मारते हुए कार क्यों चला रहे हो?” प्रशान्त ने झटकती हुई कार में झूलते हुए कुमार से पूछा।

 “प्रशान्त भाई, मैं तो कार ठीक चला रहा हूं, मालूम नही, यह अचानक से झटके क्यों खा रही है?” कुमार ने झटके खाती कार को संभालते हुए कहा।

 “कार को थोडा साईड करके देख लेते हैं। “हो सकता है, कि डीजल में कचरा आ गया हो, थोडी रेस दे कर देखता हूं, कि कार रिदम में आ जाए।

 “ कुमार ने क्लच दबाते हुए कार का ऐक्सीलेटर दबाया, लेकिन कोई खास कामयाबी नही मिली, कार झटके खाती हुई रूक गई।

  “अब क्या करे?” चारों के मुख से एक साथ निकला। सभी सोचने लगे, कि काली रात के साए में कुछ भी नजर नही आ रहा था,

 सोने पे सुहागा तो धुन्ध ने कर दी थी। धीरे धीरे धुन्ध बढ रही थी। ठंडक भी धीमे धीमे बढ रही थी। कार सडक की एक साईड पर खडी थी।

 इक्का दुक्का कार, टैक्सी आ जा रही थी। “प्रशान्त बाहर निकल कर मदद मांगनी पडेगी। कार में बैठे रहने से कुछ नही होगा।

 कार तो हम चारों का चलाना आता है, लेकिन कार के मैकेनिक गिरी में चारों फेल है। शायद कोई कार या टैक्सी से कोई मदद मिल जाए।

 “ कह कर कुमार कार से बाहर निकला। एक ठंडे हवा के तेज झोके ने स्वागत किया। शरीर में झुरझरी सी फैल गई।

प्रशान्त भी कार से बाहर निकला। पायल और कामना कार के अंदर बैठे रहे। ठंड बहुत अधिक थी

 दिल्ली निवासियों कुमार और प्रशान्त की झुरझरी निकल रही थी। दोनों की हालात दयनीय होने लगी।

 “थोडी देर खडे रहे तो हमारी कुल्फी बन जाएगी।“ कुमार ने प्रशान्त से कहा।

 “ठीक कह रहे हो, लेकिन कर भी क्या सकते है।“ प्रशान्त ने जैकेट की टोपी को ठीक करते हुए कहा।

“लिफ्ट मांग कर शिमला चलते है, कार को यहीं छोडते है। सुबह शिमला से मैकेनिक ले आएगें।“ कुमार ने सलाह दी।

 “ठीक कहते हो।“ रात का समय था। गाडियों की आवाजाही नगण्य थी। काफी देर बाद एक कार आई।

 उनको कार के बारे में कुछ नही मालूम था, वैसे भी कार में पांच सवारियां थी। कोई मदद नही मिली।

 दो तीन कारे और आई, लेकिन सभी में पूरी सवारियां थी, कोई लिफ्ट न दे सका। एक टैक्सी रूकी।

 ड्राईवर ने कहा, जनाब मारूती, होंडा, टोएटा की कार होती तो देख लेता, यह तो बीएलडब्लू है, मेरे बस की बात नही है।

 एक काम कर सकते हो, टैक्सी में एक सीट खाली है, पति, पत्नी कुफरी से लौट कर शिमला जा रहे हैं।

उनसे पूछ तो, तो एक बैठ कर शिमला तक पहुंच जाऔगे। वहां से मैकेनिक लेकर ठीक करवा सकतो हो। टैक्सी में बैठे पति, पत्नी ने इजाजत दे दी।

  कुमार टैक्सी में बैठ कर शिमला की ओर रवाना हुआ। प्रशान्त कार में बैठ गया। प्रशान्त पायल और कामना बातें करते हे समय व्यतीत कर रहे थे।

 धुन्ध बढती जा रही थी। थोडी देर बाद प्रशान्त पेशाब करने के लिए कार से उतरा। कामना, पायल कार में बैठे बोर हो गई थी।,

मौसम का लुत्फ उठाने के लिए दोनों बाहर कार से उतरी। कपकपाने वाली ठंड थी।

 “कार में बैठो। बहुत ठंड है। कुल्फी जम जाएगी।“ प्रशान्त ने दोनों से कहा।

 “बस दो मिन्ट मौसम का लुत्फ लेने दो, फिर कार में बैठते हैं।“ पायल और कामना ने प्रशान्त को कहा। “भूतिया माहौल है। कार में बैठते है।“ प्रशान्त ने कहा।

 प्रशान्त की बात सुन कर पायल खिलखिला कर हंस दी। “भूतिया माहौल नही, मुझे तो फिल्मी माहौल लग रहा है।

 किसी भी फिल्म की शूटिंग के लिए परफेक्ट लोकेशन है। काली अंधेरी रात, धुन्ध के साथ सुनसान पहाडी सडक।

 हीरो, हीरोइन का रोमांटिक मूड, सेनसुएस सौंग। कौन सा गीत याद आ रहा है।“

 “तुम दोनों गाऔ। मेरा रोमांटिक पार्टनर तो मैकेनिक लेने गया है।“ कामना ने ठंडी आह भर कर कहा।

 तीनों हंस पडे। तीनों अपनी बातों में मस्त थे। उनको मालूम ही नही पडा, कि कोई उन के पास आया है।

 एक शख्स जिसने केवल टीशर्ट, पैंट पहनी हुई थी, प्रशान्त के पास आ कर बोला “आपके पास क्या माचिस है?”

 इतना सुन कर तीनों चौंक गए। जहां तीनों ठंड में कांप रहे थे, वही वह शख्स केवल टीशर्ट और पैंट पहने खडा था, कोई ठंड नही लग रही थी उसे।

 प्रशान्त ने उसे ऊपर से नीचे तक गौर से देख कर कहा। “आपको ठंड नही लग रही क्या?”

 उसने प्रशान्त के इस प्रश्न का कोई उत्तर नही दिया बल्कि बात करने लगा “आप भूतिया माहौल की अभी बातें कर रहे थे।

 क्या आप भूतों में विश्वास करते हैं? क्या आपने कभी भूत देखा है?”

 “नही, दिल्ली में रहते है, न तो कभी देखा है और न कभी विश्वास किया है, भूतों पर।“ प्रशान्त ने कह कर पूछा, “क्या आप विश्वास करते है?“

 “हम पहाडी आदमी है, हर पहाडी भूतों को मानता है। उन का अस्तित्व होता है।“

 उस शख्स की भूतों की बाते सुन कर कामना और पायल से रहा नही गया। उनकी उत्सुक्ता बढ गई।,

 “भाई, कुछ बताऔ, भूतों के बारे में। फिल्मी माहौल हो रखा है, कुछ बात बताऔ।“,

 उस शख्स ने कहा “देखिए, हम तो मानते है। आप जैसा कह रहे हैं, कि शहरों में भूत नजर नही आते, हो सकता है, नजर नहीं आते होगें

 मगर पहाडों में तो हम अक्सर देखते रहते है। “कहां से आते है भूत और कैसे होते हैं, कैसे नजर आते है।“ प्रशान्त ने पूछा।

 उस शख्स के हाथ में सिगरेट थी, वह सिगरेट को हाथों में घुमाता हुआ बोला “भूत हमारे आपके जैसे ही होते हैं। वे रौशनी में नजर नही आते है।“

 “होते कौन है भूत, कैसे बनते है?“ पायल ने पूछा। “यहां पहाडों के लोगों का मानना है, कि जो अकस्मास किसी दुर्घटना में मौत के शिकार होते है

 या फिर जिनका कत्ल कर दिया जाता है, वे भूत बनते है।“ उस शख्स ने कहा। “क्या वे किसो को नुकसान पहुंचाते है, मारपीट करते हैं?” प्रशान्त ने पूछा।

 “अच्छे भूत किसी को कुछ नुकसान पहुंचाते है। अच्छा मैं चलता हूं। सिगरेट मेरे पास है। आप के पास माचिस है, तो दीजिए, सिगरेट सुलगा लेता हूं।

 “ उस शख्स ने कहा। प्रशान्त ने लाईटर निकाल कर जलाया। उस शख्स ने सिगरेट सुलगाई। लाईटर की रौशनी में सिर्फ सिगरेट नजर आई

 वह शख्स गायब हो गया। लाईटर बंद होते ही वह शख्स नजर आया। तीनों के मुख से एक साथ निकला – भूत।

 तीनों, प्रशान्त, पायल और कामना का शरीर अकड गया और बेसुध होकर एक दूसरे पर गिर पडे।

 अकडा शरीर, खुली आंखें लगभग मृत्य देह के सामान तीनों मूर्क्षित थे। वह शख्स कुछ दूरी पर खडा सिगरेट पी रहा था।

 तभी वहां आर्मी का ट्रक गुजरा। उसने ट्रक को रूकने का ईशारा किया। ट्रक ड्राईवर उसे देख कर समझ गया, कि वह कौन है।,

 ट्रक से आर्मी के जवान उतरे और तीनों को ट्रक पर डाला और शिमला के अस्पताल में भरती कराया।

 कुछ देर बाद कुमार कार मैकेनिक के साथ एक टैक्सी में आया। अकेली कार को देख परेशान हो गया, कि तीनों कहां गये।

 वह शख्स, जो कुछ दूरी पर था, कुमार को बताया, कि ठंड में तीनों की तबीयत खराब हो गई, आर्मी के जवान उन्हें अस्पातल ले गये हैं।,

 कह कर वह शख्स विपरीत दिशा की ओर चल दिया। मैकेनिक ने कार ठीक की और कुछ देर बाद शिमला की ओर रवाना हुए।

 कुमार सीधा अस्पताल गया। डाक्टर से बात की। डाक्टर ने कहा कि तीनों को सदमा लगा है। वैसे घबराने की कोई आवश्कता नही है

 लेकिन सदमें से उभरने में समय लगेगा। कुमार को कुछ समझ नही आया, कि उन्होनें क्या देखा, कि इतने सदमे में आ गए।

अगली सुबह आर्मी ऑफिसर अस्पताल में तीनों को देखने आया। कुमार से कहा – “आई एम कर्नल अरोडा, मेरी यूनिट ने इन तीनों को अस्पातल एडमिट कराया था।“

 कुमार ने पूछा – “मुझे कुछ समझ में नही आ रहा, कि अचानक से क्या हो गया?“

 कर्नल अरोडा ने कुमार को रात की बात विस्तार से बताई, कि वह शख्स भूत था, जिसे देख कर तीनों सदमें में चले गए और बेसुध हो गए।

 वह एक अच्छा भूत था। अच्छे भूत किसी का नुकसान नही करते। उसने तीनों की मदद की। हमारे ट्रक को रोका और कुमार के वापिस आने तक भी रूका रहा।

 शाम तक तीनों को होश आ गया। दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली और सभी दिल्ली वापिस गए, लेकिन सदमें से उभरने में लगभग तीन महीने लग गए।

 आज सात साल बीत गए उस घटना को। चारों कभी भी घूमने रात को नही निकलते। नाईट लाईफ बंद कर दी।

 घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, बस यही रूटीन है उन का। उस घटना को याद करके आज भी उनका बदन ठंडा होने लगता है। Hindi Horror Story 2020

4. डर से भी बड़ा..डर – Horror Story

खड़ खड़–खड़ खड़..ट्रेन द्रुत गति से भागी चली जा रही थी।संध्या काल का समय था,

 तेज बारिश और बीच बीच मे बिजली की चमक वातानुकूलित कोच की खिड़कियों से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी।

 केबिन का एकांत और यह भयावह मौसम मुझ जैसे डरपोक आदमी को और डरा रहा था।

 थोड़ी देर बाद गाड़ी के पहियों की रफ़्तार कम हुई और एक मध्यम से स्टेशन पर गाड़ी रुकी।बारिश इतनी ज्यादा थी

 कि मैं स्टेशन का नाम नहीं पढ़ पा रहा था।मैं अपने केबिन मे अकेला था और इस उधेड़बुन मे था की कोई सह यात्री आये,

 जिससे वार्तालाप करते करते आगे का रास्ता आसानी से काटा जा सके और एक अंदरुनी भय जो मेरे अंदर जागृत हो चुका है

 उससे मुझे निजात मिल सके।तभी किसी ने केबिन का दरवाजा खटखटाया और एक शांत सा दिखने वाला व्यक्ति केबिन मे दाखिल हुआ।

अपना सामान आदि व्यवस्थित करने के बाद वो मेरी तरफ देख कर मुस्कराया और मेरी तरफ हाथ आगे बढ़कर उसने अपना परिचय दिया..

 मैं मिस्टर घोष…।वो बोला -मैं कोलकाता जा रहा हूँ..पुनर्जन्म से सम्बंधित एक कार्यशाला मे भाग लेने के लिए।

मैंने उसे बताया कि मैं कानपुर मे व्याख्याता के पद पर हूँ और पटना जा रहा हूँ।

 उसने कुछ खाने का सामान निकाला और मुझसे भी खाने हेतु आग्रह किया।किन्तु मैं बहुत ही सशंकित व्यक्तित्व का प्राणी..

 ट्रेन मे किसी अजनबी के द्वारा दिए गए खाने को लेना असंभव था मेरे लिए।मैंने बहुत विनम्रता से उसके आग्रह को ठुकराया।

 वो भी कम उस्ताद नहीं था …कस कर हँसा और बोला- संशय कर रहे हैं मेरे ऊपर,अभी तो कुछ नहीं देखिये आगे क्या क्या होता है।

 उसके यह शब्द सुन कर मुझे सांप सूंघ गया किन्तु मैंने किसी तरह अपनी घबराहट को छिपाया।

 कोई स्टेशन आने पर वो उतरता और ट्रेन चलने के बाद किसी दूसरे कम्पार्टमेंट से चढ़ कर फिर आ जाता।

 पूछने पर बोलता की बीच बीच मे रेलवे की नौकरी भी कर लेता हूँ।थोड़ी देर बाद मैं और वह विभिन्न विषयों पर चर्चा करने लगे।

 उसने पुनर्जन्म से सम्बंधित बातें प्रारम्भ कीं और पुनर्जन्म को अन्धविश्वास बताया।थोड़ी देर बाद उसने मुझसे पूछा की क्या आप भूत-प्रेत पर विश्वास करते हैं?

मैंने कहा-बिल्कुल।वो जोर से हँसा और बोला यह सब बकवास है।मुझे भूतों पर विश्वास था किन्तु वो भूतों के अस्तित्व को नकारता रहा।

 रात अपने यौवन पर पहुँच चुकी थी,चर्चा उपरांत मैं वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के कक्ष मे सोने का प्रयास कर रहा था।

 अचानक मुझे ऐसा अनुभव हुआ की कोई मेरे गले पर गर्म अंगार रख रहा है।.

मैं हड़बड़ा कर उठा …कहीं कोई नहीं…मेरे अलावा उस कक्ष मे मेरा वही सह यात्री था जो सामने की बर्थ पर लेटा घोड़े बेंचकर सो रहा था।

 मैं फिर सोने का प्रयास करने लगा।अभी आँख लगी ही थी की मुझे अपने पेट पर बहुत तेज दबाव और हंसने की तेज आवाज सुनाई दी।

 मैं घबराकर उठा तो देखा की सहयात्री बर्थ पर नहीं था।लगभग एक दो मिनट बाद वो आया और बोला जनाब सोये नहीं…

 मैंने अपनी घबराहट रोकते हुए उससे कहा अभी नींद नहीं आ रही और मैंने अपने बैग से एक मैग्जीन निकाली और पढ़ने का नाटक करने लगा।

 सहयात्री भी बर्थ पर लेट गया और कुछ देर मे उसके खर्राटे केबिन मे गूंजने लगे।मैं भी थोडा निश्चिन्त हुआ और बर्थ पर आँख बंद कर लेट गया।

 ट्रेन कभी धीमी होती कभी रफ़्तार पकड़ लेती लेकिन मेरे दिल ने अब तेज रफ़्तार ही पकड़ रखी थी…,

 भय और घबराहट के कारण लघुशंका की इच्छा अपने आप जीवित हो जाती है..और मैं टॉयलेट की तरफ मुड़

 जैसे ही मैंने टॉयलेट का दरवाजा खोला वो सहयात्री मुझे अंदर दिखा और मैं चिल्लाते हुए अपनी बर्थ की तरफ भागा… ,

  देखा तो वो सहयात्री इत्मिनान से अपनी बर्थ पर सो रहा है…मैंने घबराहट मे उसे जगाया…वो बोला..अरे क्या हुआ ? इतना मासूम लग रहा था ,

 वो जैसे कुछ जानता ही ना हो….मैंने कहा- आप यहाँ भी और वहां टॉयलेट मे भी….वो कुटिलता से हँसा और बोला -मैं कितने रूप मे कहीं पर भी रह सकता हूँ।

 घबराहट के मारे मैं पसीने से तर बतर..बिल्कुल निर्जीव सा खड़ा उसके सामने।वो बोला -तुम्हें भूतों पर विश्वास था ना..

 तुम्हे तुम्हारे विश्वास का प्रमाण देना था।तुम्हारे जैसे लोगों के कारण ही हम भूत-पिशाच लोगों का अस्तित्व है…

इतना कहकर वो मेरी आँखों के सामने से अचानक गायब हो गया।मैं डर के मारे अवाक् और निर्जीव सा अपनी बर्थ पर बैठा था।

तभी केबिन के अंदर टिकट निरीक्षक आया उसका चेहरा देखकर मुझे बेहोशी छाने लगी क्योंकि यह वही सहयात्री था मेरा..और वो टिकट चेक कर मुस्कराता हुआ चला गया… Hindi Horror Story

5. दरवाज़ा खोलो – Hindi Horror Story

विनय एक बीमा कंपनी में काम करते है। उनकी कंपनी उनको एक जगह से दूसरे जगह ग्राहक से मिलने के लिए भेजती रहती है जिसके कारण वो अपना घर एक ठिकाने पर नहीं रख सकते थे|

इस बार उन को नेपाल के छोटे से पहाड़ी इलाके में जाना था करीब 1 महीनो के लिए। इसलिए इस बार उन्होंने अपनी पत्नी को भी साथ ले लिया।

 परिवार में सिर्फ वो और उनकी पत्नी ही रहती थी। विनय और उसकी पत्नी दोनों नेपाल के लिए निकल पड़े वैसे भी ठण्ड का मौसम था और नेपाल में ऊपर से बहुत तेज़ बर्फ पड़ रही थी।

 वो लोग अपने घर पहुँच चुके थे। अपने घर तक पहुँचने के लिए उनको बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि घर छोटे से गाँव में एक पहाड़ी इलाके में था। जिसकी वजह से दोनों बहुत थक चुके थे।

 रात के 12:30 बज चुके थे। जहाँ वो रह रहे थे वहाँ दूसरे घर एक दुसरो से बहुत दूर दूर थे।

 बाहर ज़ोरो से ठंडी हवा और बर्फ गिर रही थी। दोनों अपने रजाई में दुबक कर आराम ही कर रहे थे की अचानक उनको लगा की किसी ने उनके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।

 फिर उन्होंने सोचा की क्या पता तेज़ हवा चलने की वजह से ऐसा जो रहा हो इसी लिए उन्होंने उसको अंदेखा कर दिया। ,

 अगली सुबह विनय जिस काम के लिए आया था उसके लिए वो निकल पड़ा उसकी पत्नी घर में अकेले ही थी।,

 उसको समझ नहीं आ रहा था कि वो घर में बैठे वक़्त कैसे बिताए उसने सोचा की चलो क्यों न बाहर जा कर ही कुछ देख लिया जाए।

 बाहर ठण्ड तो थी पर हवा नहीं चल रही थी। इसी लिए उसने अपना स्वेटर पहना और बाहर निकलने को तैयार हो गयी जैसे ही उसने अपना घर का गेट खोला वैसे ही देखती है कि घर के पास बने एक खम्बे के पीछे एक छोटा सा बच्चा खड़ा है।

 जो उसको चुपके चुपके देख रहा है। विनय की पत्नी ने उसको अपनी और बुलाया पर वो नहीं आया और वो वहाँ से भाग गया।

 अगले दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ वो लड़का उसको फिर से घूरे देखा जा रहा था इस बार उसकी पत्नी ने उस बच्चे को पकड़ लिया और पूछा की तुम यहाँ क्या कर रहे हो।

 उस बच्चे ने कुछ नहीं बोला और न ही कुछ बताया। विनय की पत्नी ने उससे उसके घर के बारे में पूछा तब भी वो कुछ नहीं बोल रहा था।

 आखिर में उसका नाम पूछने पर उसने अपने धीमी सी आवाज़ में अपना नाम सूर्य बताया और फिर वहाँ से भाग गया।

 उसको उसका व्यवहार कुछ समझ नहीं आया। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा वो बच्चा रोज़ उसको खम्बे के पीछे से निहारता रहता था।

 उस दिन रविवार की रात थी दोनों घर में अँगीठी के सामने आग ताप रहे थे क्योंकि बाहर की हालत बहुत ख़राब थी इतनी ख़राब की कोई थोड़ी देर के लिए बाहर निकल जाए तो उसकी जान चली जाए।

 अचानक दरवाज़ा किसी ने खटखटाया उन दोनों को फिर से लगा की शायद हवा की वजह से ऐसा हो रहा हो।

तभी फिर से किसी ने दरवाजा खटखटाया। इस बार खटखटाने की आवाज़ साफ़ आरही थी। ,

 ये आवाज़ सुन कर दोनों डर गए क्योंकि इतनी रात को वो भी जान ले लेने वाली ठण्ड में आखिर कोन हो सकता है।

 दोनों केवल एक दूसरे का मुह देख रहे थे। अचानक दरवाज़े के बाहर से धीरे धीरे रोने की आवाज़ आने लगी। तभी विनय ने जोर से आवाज़ में बोला \कौन है बहार\

 कुछ देर तक आवाज़ तो नहीं आई पर बाद में एक धीमी सी आवाज़ आई \दरवाज़ा खोलो\….. \कृपया करके दरवाज़ा खोलो, बहुत ठण्ड है।\

 ये आवाज़ किसी छोटे से बच्चे की थी। तभी विनय की पत्नी को ये आवाज़ जानी पहचानी लगी उसने कहाँ कि ये तो वही बच्चे की आवाज़ लगती है जो रोज़ घर के बाहर खड़ा रहता था।

 विनय की पत्नी ने कहा कि हमें उसे अंदर लाना चाहिये। वो भागते हुए अभी दरवाज़े के पास जा ही रही थी की अचानक उनके घर के फ़ोन की घंटी बाजी। ,

 फोन एक पड़ोस में रहने वाली औरत का था जिससे आज ही विनय की पत्नी मिल कर आई थी।

 विनय की पत्नी ने फ़ोन उठाया। वहाँ से उस औरत की आवाज़ आई \हेल्लो, जी मै आपको बताना भूल गई थी की अगर आपके घर के बाहर कोई भी दरवाज़ा खटखटाए तो उसको मत खोलना।\

 विनय की पत्नी ने कहा की \अभी मेरे घर जे बाहर एक बच्चे की आवाज़ आरही है जो दरवाज़ा खोलने को कह रहा है\

 तभी उस औरत ने कहा कि \ नहीं आप बिलकुल मत खोलना, वो असल में एक आत्मा है। यहाँ जब जब तेज़ आंधी और ठण्ड पड़ती है वो तब तब सबके घर के बहार जाता है और दरवाज़ा खोलने को कहता है।

 वो ठण्ड का बहाना बनाता है और दरवाज़ा खुलवाने की कोशिश करता है । अगर कोई गलती से भी दरवाज़ा खोल देता है तो वो अगले दिन बर्फ में दबा हुआ मिलता है।\

 ये सुनते ही जैसे उनके पैरों से ज़मीन ही खिसक गयी। वो सोचने लगी की जो बाहर दरवाज़ा खटखटा रहा है वो असल में एक आत्मा है।

 उन्होंने ने दरवाज़ा नहीं खोला अगले दिन ही वो दोनों भाग कर पडोसी के पास गए और पूरे मामले के बारे में पूछा।

 उस औरत ने बताया कि इस गाँव में एक परिवार रहता था पहाड़ टूटने की वजह से उस परिवार का विनाश हो गया बस एक बच्चा बच गया।

 वो दुसरो के घर जा जा कर खाना मांगता। एक दिन बहुत ज़ोरो से बर्फ की आंधी पड़ रही थी।

 वो दुसरो के घर के बाहर दरवाज़ा खटखटा कर घर के अंदर आने को गुहार लगा रहा था।

 पर किसी ने भी उसकी गुहार नहीं सुनी ठण्ड की वजह से सब अपने घरों में दुबके हुए थे। कल सुबह होने पर उस बच्चे की लाश बर्फ में अकड़ी हुई मिली।

 आज भी कभी भी ज़ोरो से बर्फ की आंधी आती है तो उसकी आत्मा सबके घर के पास आती है और गुहार लगाती है। ये सब सुन कर दोनों हैरान रह गए।

लेकिन वो वहाँ 1 महीने जब तक रहे तब तक 3-4 बार उनके साथ ऐसा ही हुआ। लेकिन विनय का काम खत्म हो जाने पर वो वहाँ से चले गए।

 पर विनय की पत्नी में दिमाग में एक रहस्य हमेशा बना रहा की उस घटना के बाद जो बच्चा उसे रोज़ घर के बाहर दिखता था वो कभी नहीं दिखा। Horror Hindi Story

6. ख़ौफ़ – Hindi Horror Story 2020

शाम ढल रही थी | आसमान पुरा काला पड चुका था जैसे किसी ने काले रंग की शीशी उडेल दि हो | शायद बारिश आने को बेकरार है |,

 घिरा हुआ आसमान और ठंडी हवाये चाँदनी को बेहद पसंद थी | बारिश चाँदनी के बदन में एक अजब सी सिहरन पैदा करती थी |

 चाँदनी आईने के सामने पिछले आधे घंटे से बन-सवर रही थी | बन-सवर क्या ? सजने की रिहर्सल कर रही थी |

 तीन बार तो साडीयाँ चेन्ज कर चुकी थी | चाँदनी को साज-श्रुंगार का बहुत शौक था आज उसे मिसीस कपूर की बेटी की शादी में जाना था |

 चाँदनी कॉलेज की अध्यापक थी मगर दिखती कॉलेज स्टुडन्ट जैसी ! वो हमेशा खूबसूरत दिखना और खूबसूरत रहना चाहती थी |

चाँदनी अब तैयार होकर रवाना हि हो रही थी उसके नजर अखबार पर पड़ी | उसमें कोई भैरव चौक की खबर थी |

 लिखा था की भैरव चौक नाम के एक छोटे से इलाके में बहुत सारी अजीबो-गरीब घटनाएं घटी है |

कितनी वारदातें हुई है लूट-मार, हत्या, अपहरण, बलात्कार, भूत-प्रेत का साया, सभी घटनाएं वही तो घटी है लोग वहाँ दिन के उजाले में भी जाने का साहस नहीं करते थे |

 ये खबर पढते ही थोडे समय पहले चाँदनी का चमकता चहेरा फिका पड गया उसके चहरे पर मानो हलका खौफ मंडरा रहा हो !

थोडी देर वो खामोश होकर वही खडी रही मानो ये खबर उसके मन में घर कर गई हो ! चाँदनी की खामोशी मिसीस कपूर के फोन ने तोडी |

 चाँदनी ने फोन उठाया और बातें करते वहाँ से कार में निकल गई | चाँदनी को शादी में पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं आई |

चाँदनी ने गाडी से बाहर निकलने से पहले एक बार फिर अपना चेहरा निखार लिया था | चाँदनी का स्वागत हँसते चहेरो ने किया |

मगर कुछ चहेरे ऐसे भी थे जिसने चाँदनी को बुरी नियत से देखा | वो चहेरे थे कॉलेज के बदमाश और कॉलेज ट्रस्टी के बीगडे हुए लडके !

कॉलेज ऊन लडको को पाँच पापी बुलाती थी | लडकीयो को छेड़ना, लडकीयो के साथ बद-तमीजी करना, लड़ना-झघडना

 वो सब उन पांचो को काम था इसलिए कॉलेज उसे पाँच पापी बुलाती थी | खैर ! चाँदनी भी उनकी हरकतों को भलीभाती जानती थी

 इसलिए उसको अनदेखा करके शादी में शामिल हो गई | नाच-गाना, खाना-पीना, गप्पे लडाने और बिदाई में पता हि नहीं चला के ……

 रात के 11 बज गये है | उसे घर पहुँचने में अभी उसे 2 घंटो का फासला तय करना था | चाँदनी के पति जतीन का फ़ोन आता था |

 ‘हेल्लो चाँदनी ? कहा हो ?’ – जतीन ने कहा | ‘में शादी में आई थी पर बहुत देर हो गई है

 बस मिसीस माथुर के साथ अब निकल ही रही हुं’ – चाँदनी ने बातें खतम करके फोन रखा |

 चाँदनी ने फटाफट से मिसीस कपुर बाय किया और मिसीस माथुर को ढुंढने लगी मगर पता चला की मिसीस माथुर तो घर के लिए कब की रवाना हो चुकी है |

 चाँदनी सोचने लगती है की अब अकेली घर कैसे जायेगी ? तभी अचानक से तेज बिजली कडकी …सायद थोडे समय के बाद बारिश होने वाली है

  उसने किसी परवा करे बिना वहाँ से अकेली निकल पड़ी मगर वो पाँच पापी चाँदनी की हर हरकत नजर रखे हुए थे |

चाँदनी ने बस थोड़ा सा हि फासला तय किया हि था की बारिश की बुंदाबारी आने लगी |

चाँदनी मन हि मन सोच रही थी की वो बारिश बंद होने का इन्तजार करे ? या फीर आगे बढे ?

 चाँदनी को जल्द हि तय करना था उसे क्या करना है ? उसने आगे बढ़ने का फैसला किया |

 चाँदनी की कार थोडी आगे बढी ही थी की तेज बारिश शरु हो गई | हमेशा चाँदनी को सिहरन देने वाली बारिश की बुंदे आज बाधा बन रही थी |

 चाँदनी बारिश की बुंदोबारी को चीरती आगे बढ़ रही थी | चाँदनी का आगे बढ़ने का फैसला सही था क्योंकि बारिश बंद हो चुकी थी |

चाँदनी हलके मन से ड्राईव कर रही थी मगर …लगता है आज का दिन चाँदनी के लिए सच-मुच भारी था क्योंकि सामने ट्राफीक जाम था |

 गाडीयों की लम्बी लाईन लगी थी | किसी से पूछा तो पता चला की भारी बारिश के चलते आगे का रास्ता पुरा ब्लॉक हो चुका है |

 जब तक रास्ता साफ नहीं होगा तब तक ट्राफिक जाम रहेगा और रास्ता साफ होने में सुबह भी हो सकती है |

सुबह का नाम सुनते हि चाँदनी की हवाईयाँ उड लगी | तभी चाँदनी देखती है की कुछ गाडीया कच्ची सड़क की तरफ़ जा रही है |

 ‘भैया ये कच्ची सड़क कहा जाती है ?’ – चाँदनी ने किसी से पुछा | ‘ये कच्ची सड़क शहर जाती है बहन जी’

 चाँदनी फिर से सोचने लगी की वो रास्ता खुलने का इन्तजार करे या फिर कच्चे रास्ते से जाये ?

 उसने सोचा की वो कब तक अकेली रास्ता साफ होने का इन्तजार करेंगी ? वो भी कच्ची सड़क की तरफ़ जा रही गाडियां के साथ गाडी चला कर शहर वाले रास्ते जा सकती है,

 इसलिए उसने वो कच्ची सड़क से घर जाने का फैसला किया | चाँदनी आगे बढ़ तो रही थी मगर खौफ़ अभी भी उसके सीर पर डर मंडरा रहा था

 क्योंकि वो आगे चल रही गाडियां के सहारे जा रही थी जैसे कोई दीपक की रोशनी लेकर अंधेरे से गुजर रहा हो !,

 आगे चल गाडीयो की रफ्तार तेज होती है वो सब चाँदनी की कार से आगे बढ़ जाती है |

 इतनी बढ जाती है की वो सब कारे हेडलाईट के सहारे देखी जा सकती थी | चाँदनी भी उन तक पहुंचने के लिए अपनी गाडी की स्पीड बढाती है मगर …. गाडी अचानक से बंद हो जाती है |

 गाडी बंद होते हि चाँदनी बदहवास सी हो जाती है | वो वहाँ अकेली थी आगे पीछे कोई नहीं था |,

 आगे जाती गाडीयाँ एक के बाद एक आंखो से ओझल हो रही थी | चाँदनी अब बेचेन सी होने लगी थी | धडकने तेज चल रही थी |

 उसके माथे से डर की बुंदे एक के बाद टपकने लगी थी उसके आंखो में खौफ साफ़ दिख रहा था | वो गभराके जोर-जोर से सांसे ले रही थी |

 उसने अपने पर्स से फोन निकाला और जतीन का नंबर डायल करने लगी मगर वहाँ मोबाइल कनेशन के नाम पर कुछ नहीं था |

 वो इतना डर गई थी की वो गाडी से बाहर निकलना भी नहीं चाहती थी | उसे कुछ सूझ नहीं था बस गाडी स्टार्ट करने में लगी थी

 वो बार बार चाबी को डाए-बाए घुमा रही थी मगर नतिजा वही गाडी स्टार्ट नहीं हो रही थी | अचानक से चाँदनी की नजर उसके पर्स में जाती है

 और उसमें एक तवीज दिखता है वो तवीज जो चाँदनी की माँ ने आखरी सांस लेते वक्त दिया था और कहा था की ‘ये तवीज बुरे वक्त में तुम्हारी हिफाजत करेगा’ |

चाँदनी ने तुरंत तवीज लिया और आँखें बंद करके फ़िर से गाडी स्टार्ट करने की कोशिश करने लगी |

माँ का दिया तवीज काम कर गया था गाडी एक झटके में स्टार्ट हो गई थी | चाँदनी के तो जान में जान आई हो ऐसे राहत की सांस ली |

 चाँदनी तवीज की शक्ती से अचंभित हो गई | वह समय व्यर्थ किये बिना वहाँ से चल दी |

 चाँदनी एकादा किलोमीटर का रास्ता काटा था वहाँ उसे एक बोर्ड दिखता है उसे बोर्ड पे लिखा था .भैरव चौक .!

 भैरव चौक नाम पढते ही रौगटें खड़े हो गये और आँखें खुली की खुली रह गई उसकी सांसे फिर से तेज रफ्तार से बढ़ने लगी |

 वही भैरव चौक जिसके बारे चाँदनी्ने पढा था जहाँ पर खुन, बलात्कार जैसे वारदातें हुई थी |

 उसने फ़िर से तवीज को हाथ में थामा और एक पल के लिए आँखें बंद की जैसे वो भगवान से दुआ मांग रही हो के अब की बार गाडी बंद ना हो !

 मगर . ये क्या ? चाँदनी की कार भैरव चौक के नाम के बोर्ड के ठिक सामने आ कर रुक गई |

 चाँदनी ने बाहर का नजारा देखा तो वो बेहद अँधेरा और डरावना था | जुगनु की टमटमाटी रोशनी के सीवाँ कुछ दिखाई नहीं दे रहा था |

 चाँदनी ने फिर से तवीज उठाया और आँखें बंद कर के भगवान का नाम लेती हुई गाडी स्टार्ट करने में जुट गई |

 गाडी के चाबी को डाई-बाई घुमाकर उसकी उंगलीया तक थक गई थी मगर अब की बार गाडी शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही थी |

 एक दो बार फोन भी लगाया मगर वहाँ भी उसे नाकामीयबी मिली वो इतनी डरी हुई थी की गाडी से बाहर निकलने में भी उसके पैर कांप रहे थे |

 तभी ..उसे सामने कुछ दिखा .. सामने से सफेद रंग की कुछ धुंधली-धुंधली आकृति आ रही थी |,

 चाँदनी उसे देख दहल गई और बदन में कंपकंपी होने लगी | वो आकृति जैसे-जैसे आगे आ रही थी वैसे-वैसे एक आकृति से तीन आकृतियाँ हो गई थी |

 काले घने अंधेरे में सफेद रंग साफ-साफ दिख रहा था | चाँदनी उसे देख बस सोच रही थी ये क्या आ रहा है ? सफेद चादर ओढे कोई आदमी ?

 या फ़िर कोई भूत-प्रेत.. ? चाँदनी के पसीने छुटने लगे थे | चाँदनी ने जल्दी से गाडी के शीशे बंद है की नही ये तसल्ली कर ली और वहाँ बैठे-बैठे तवीज को थामे आंखे बंद करके भगवान का नाम जपने लगी |

 अब वो आकृतियाँ चाँदनी के गाडी के आगे पीछे मंडराने लगी थी | सहमी हुई चाँदनी जोर-जोर सांसे लेकर, हलकी सी कनकियों से देख रही थी |

 तभी किसी ने गाडी के शीशे पर जोरदार वार किया | चाँदनी उस तरफ देखा तो मालुम पडा के वो गाडी के शीशे तोडने की कोशीश कर रहे थे |

 चाँदनी गभराके जोर-जोर से चील्लाने लगी – ‘बचाओ , बचाओ !’ चाँदनी चिल्लाती रही और वो शीशे पर वार करते रहे और एक शीशा तोड़ दिया |

  शीशे टुटते ही चाँदनी को कही से मदद मिल जाये इसलिए वो जोर से चिल्लाने लगी – ‘बचाओ, कोई मुझे बचाओ !!’

 किसी ने गाडी का दरवाजा खोल दिया और चाँदनी का हाथ पकद के गाडी से एक झटके में बाहर फ़ेक दिया |

 चाँदनी गाडी से बाहर गीरकर एक पत्थर से आ टकराई | चाँदनी मानो अधमरी सी हो गई थी

 उसने हिम्मत जुटाई और वहाँ से उठ खड़ी हो गई तो उसने देखा के वहाँ तीन सफेद चादर ओढे तीन शख्स थे |

 वो तीनो के चहरे काले, दहशतभरे और भयानक थे और सब हाथ में चक्कू लेकर खड़े थे |

 चाँदनी समझ गई के ये सब लुटेरे है और बिना कुछ बोलें चाँदनी ने सोने-चांदी के जेवर निकालने लगी |

 ‘ये सब ले लो मगर मुझे जाने दो’ – चाँदनी से बिलकते हुई उन लुटेरो से कहा |

 एक लुटेरे ने तुरंत चाँदनी के हाथों से सब जेवर छीन लिए | चाँदनी अभी भी बिकल-बिलक कर बस रोये जा रही थी |

 ‘ये सब तो हम लेंगे ही मगर इतनी लूट काफ़ी नहीं हमारे लिए’ – एक लूटेरे ने चाँदनी के उपर हवस भरी नजर डालते कहा |

 चाँदनी लूटेरो का इरादा समज गई थी और एक सांस लेकर वहाँ से भागी | वो तीनो भी चाँदनी के पीछे भागे |

 मगर सहमी हुई चाँदनी कितने तक भाग पाती ? उन तीनो भैडीये ने आखिरकार चाँदनी को पकद ही लिया |

 ‘बचाओ . बचाओ !’ – चाँदनी पुरी ताकत से चिल्लाई | ‘यहाँ तुम्हें बचानेवाले कोई नहीं आयेगा !

 चिल्लाओ जीतना चिल्लाना हो ऊतना’ – एक लुटेरे ने हँसते हुए कहा | तभी एक लुटेरे पर पिछे से तेज वार होता है | वो लुटेरा वही ढेर हो जाता है |

 चाँदनी को एक आशा की किरण दिखाई देती है | वो दोनो लुटेरे पीछे देखते है की ये वार किसने किया ?

 चाँदनी भी उस तरफ देखती जहाँ से वार हुआ था | वहाँ वो कॉलेज के पांच स्टुडन्ट होते है जीसे कॉलेज पाँच पापी कहके बुलाती थी |

 वो पाँच स्टूडन्ट बचे दो लुटेरे पर झपते है उन्हे मार मारके बेहोश कर देते है | चाँदनी वहाँ सहमी खडी आंखो से आंसु बरसाती बस देखती रही थी

 और सोच रही थी की जिस पाँच पापी को बुरा और गलत समज रही थी वही लोगो ने आज चाँदनी को बुरे हादसे से बचा रहे थे |

 ‘मेडम हम बुरे है मगर इज्जत सब की करते है आप बेफ़िकर होकर जाईये |

 ये बंटी आप को सुरक्षित घर तक छोड़ देगा और हम इन लुटेरो को पुलिस के हवाले कर देगें इन लोगो ने भूत-प्रेत के नाम पर बहुत लूट मचा रखी थी

 अब पुलिस इन्हे मजा चखायेगी – एक स्टुडन्ट ने कहा | ‘मुझे माफ कर देना ! मै तुम लोग को गलत समज नहीं थी मगर तुम ….’

 इन से आगे चाँदनी के मुँह से एक शब्द भी निकल नहीं पाये चाँदनी के आंसु ही थे जो सारी बातें बयां कर रहे थे |

 चाँदनी वहाँ से सुरक्षित होकर घर गई | Horror Story Hindi

7. उलझे बालो वाली लड़की – Honted Story in Hindi

शाम के ५ बज रहे थे उसी वक़्त मेरा मोबाइल बज उठा सामने विक्रम था हमेशा की तरह वो प्यार से बोला जानेमन क्या कर रही हो? मैंने कहा कुछ नहीं बस अब ऑफिस से निकल कर PG जाउंगी, तुम क्या आ रहे हो?

 और सामने से जो सुना उस पर विश्वास नहीं हुआ विक्रम बोला जान पैकिंग कर लो हम घूमने जा रहे है आज फ्राइडे है मंडे भी ऑफ है और ट्यूसडे की मैं छुट्टी ले लूंगा तुम बस पैकिंग करो और रास्ते के लिए कुछ खाना पैक करवा लेना मैं जल्दी पहुचता हु।

विक्रम भी ना, सरप्राइज कर देता है कभी कभी, पिछले एक महीने से इसी बात पर हमारी बहस चल रही थी, मैं उसे कह रही थी लॉन्ग वीकेंड आ रहा है प्लान बनाओ ,पर उसने अपने घर जाने की रट लगा रखी थी !

 हम दोनों ही गुडगाँव मैं जॉब करते थे अलग अलग PG मैं रहते थे हफ्ते मैं ३-४ बार मिल लेते थे पर वीकेंड पर विक्रम का घर जाना जरुरी ही था उसके पेरेंट्स उसका रास्ता देखते थे।

 मेरा अपना कहने को कोई नहीं था इस दुनिया मैं चाचा ने बचपन मैं पाल दिया पड़ा लिखा भी दिया अब जब वो नहीं रहे तो मैं उनकी फॅमिली मैं एक अवांछिनिए सदस्य हो गई इसलिए पिछले २ साल से PG मैं रहने आ गई थी

 यही विक्रम से मुलाकात हुई और कब मुलाकाते प्यार मैं बदल गई पता ही नहीं चला हम दोनों उम्र के ३० बसंत देख चुके थे अब हमारे प्यार मैं लड़कपन नहीं था एक गंभीरता थी पर हम दोनों एक साथ लिव- इन मैं रहने की हिम्मत ना जुटा पाए !

 खेर यह तो हुआ परिचय अब अपनी कहानी पर आती हु उस दिन जैसे मेरे पैरो को पंख लग गए थे, मैं बहुत खुश थी विक्रम के साथ इतने दिन बिताने की कल्पना से ही मैं सिहर उठी थी

 मैं जल्दी से सब जरुरी चीज़े पैक की, अपने वाकिंग शूज़ कसे और रेडी थी तभी फ़ोन पर मिस्ड कॉल यानि विक्रम आ गया मैंने जल्दी ही सामान गाड़ी मे रखा, और बैठते ही विक्रम को चुम लिया वो भी बहुत खुश हो गया उसने कहा रुबिन be ready हम एन्जॉय करेगे!,

 हम पूरी रात ड्राइव करते रहे और जब सुबह की पहली किरण उदित हुई तो हम उत्तराखंड के एक छोटे से हिल स्टेशन पर पहुच चुके थे वहां हमने थोड़ा घूम घाम कर देखा,

 हमे रहने के लिए नदी किनारे एक शांत सी कॉटेज मिल गई रूम बहुत बढ़िया था बड़ी बड़ी खिड़किया और सामने खूबसूरत नदी विक्रम जानता था मुझे क्या पसंद है. ,

 हमने जल्दी से फ्रेश हो कर पहले अपनी नींद पूरी करने का प्लान बनाया पर बिस्तर पर आते ही वो रोमांटिक मूड मे आ गया और फिर जो नींद आई. मेरी आँख ३ बजे के लगभग खुली विक्रम अभी भी सो रहा था

 मैंने उठ कर कपडे पहने और खाने के लिए कुछ ढूढ़ने लगी तभी मुझे लगा जैसे कोई गुनगुना रहा हो मैंने दरवाजा खोला तो लॉबी के आखरी हिस्से मे बड़ी सी खिड़की पर एक लड़की अपना सर टिकाये खोई हुई सी गुनगुना रही थी

 उसकी पीठ मेरी और थी और उसके बाल घुंगराले बिखरे हुई स्याह काले, मुझे लगा यहाँ कोई और भी है, चलो अच्छा है साथ मैं कोई अपनी उम्र का है ट्रैकिंग मे मजा आएगा तभी विक्रम ने मुझे आवाज दी. जान कहा गई,

 और तभी उस लड़की ने मुड कर मुझे देखा वो बहुत ज्यादा गोरी थी मुझे देख वो मुस्कुरा दी मैंने भी मुस्कुरा कर उसका प्रतियुत्तर दिया!

 हम तैयार हो कर लगभग ४ बजे के करीब कसबे की और निकले मैं और विक्रम दोनों भूख से परेशान थे आगे कुछ दुरी पर एक छोटा सा ढाबा दिखा. वहा हमने चाय और आलू के पराठे खाये.

 ढाबे का मालिक एक बूढ़ा सा आदमी था, वो कहने लगा आप लोग कहा रुके हो हम लंचबॉक्स भी भेज सकते है. जब हमने बतया हम कहा रुके है तो उस बुढे और ढाबे पर २-३ लोगो की आँखे फ़ैल गई

 कोई कुछ बोला तो नहीं पर कानाफूसी होने लगी थी, मुझे थोड़ा अजीब लगा पर हम उस वक़्त वहां से निकल कर नीचे बाजार की तरफ घूमने निकल गए. आते वक़्त रात का खाना पैक करवा हम कोई ७ बजे के लगभग कॉटेज पहुचे !

 मैन गेट पर शिब्बू मिल गया, वो काटेज का केयरटेकर था. उसने बतया यहाँ सिर्फ ब्रेकफास्ट और चाय -काफी ही मिल सकती है, पर पीछे की तरफ किचन है जहा आप खुद खाना बना सकते है!

 विक्रम उससे आस पास घूमने की जगह पूछने लगा और मैं रूम की तरफ बढ चली लॉबी पर पहुचते ही मुझे ठंडी हवा का एहसास हुआ मैं चाभी अभी कीहोल मैं लगा ही रही थी

  मुझे साथ के कमरे से धीमे संगीत की आवाज आई बहुत ही मधुर पर उदास सा मुझे अचानक वो लड़की याद आ गई पीछे पीछे विक्रम था

 वो कहने लगा अंदर चलो यहाँ क्यों खड़ी हो एक राउंड और हो जाये उसकी आँखों मैं शरारत थी मैं बस उसकी आँखों मैं खो गई मैं उससे दीवानो की तरह प्यार करती थी मेरे लिए सिर्फ वो ही तो था उसका प्यार जिस शर्त पर मिले मुझे मंजूर था !

 उस रात मैं बहुत सुकून से थी विक्रम की बाहो मे, बाहर किस पहर बारिश शुरू हो गई थी पता ही ना चला. मुझे प्यास लगी थी फ़ोन उठा कर देखा तो रात के २ बज रहे थे

बारिश की रिमझिम और रात का सन्नाटा अलग ही दुनिया लग रही थी, मैंने विक्रम को देखा वो किसी छोटे बच्चे की तरह सो रहा था मैंने उठ कर खिड़की खोली और बारिश की बूंदो को अपने चेहरे पर महसूस करने लगी,

 तभी साथ वाले रूम से किसी के रोने की आवाजे आने लगी कोई आदमी जोर जोर से बोल रहा था और कोई लड़की रो रही थी उनकी आवाजे स्पष्ट नहीं थी जैसे दबी दबी सी थी

 खिड़की बंद करने की आवाज से विक्रम भी उठ बैठा कहने लगा रुबिन तुम रात को खिड़की क्यों खोल रही हो यह कॉटेज नदी के पास है जंगली जानवर भी आ सकते है !

 मैंने तब दिन मैं मिलने वाली वो बिखरे बालो वाली लड़की का जिक्र किया मेरा ख्याल था वो कोई विदेशी है, विक्रम बोला उन्हें छोड़ो, कल तुम्हे एक वाटर फॉल पर ले जाऊंगा अभी इधर आओ और मुझसे लिपट जाओ !

 सुबह बड़ा फ्रेश मूड था हम जल्दी से नाश्ता करके वॉटरफॉल की तरफ निकल पड़े जाते जाते शिब्बू ने कहा आप वाटर फॉल नीचे से ही देखिएगा ऊपर चोटि पर मत जाएगा उस चोटि से फिसल कर बहुत लोग जान गवा चुके है!,

 लगभग ३ किलो मीटर की ट्रैकिंग करके हम उस वाटर फॉल तक पहुचे वहा काफी चहल पहल थी, पर्यटको के साथ साथ लोकल लोग भी थे .संडे जो था वाकई बहुत खूबसूरत जगह थी हम भी वहां फोटो लेने लगे.,

 वहा पर एक छोटा सा लड़का लगभग जला हुआ पतिला, मैग्गी और कुछ कोल्डड्रिंक की बोतले लिए बैठा था विक्रम ने उसे कहा मैग्गी के साथ साथ चाय पिला सकते हो उसने हां मे सर हिलाया.

 विक्रम उससे बाते करने मैं व्यस्त हो गया, मैं कैमरा ले थोड़ा और ऊपर को चढ़ने लगी एक पतली सी उबड़ खाबड़ पगडंडी सी थी जो वाटर फॉल के साथ साथ चल रही थी

  मुझे लगा जहा विक्रम बैठा है उसके शॉट ऊपर से जा कर लिया जाये वाटर फॉल की बढ़िया पिक्चर आएगी अभी थोड़ा आगे ही बड़ी थी की अचानक वो उलझे बालो वाली लड़की मुझे अपने आगे दिखाई दी

 वो बहुत तेजी से आगे बढ रही थी मैं लगभग भागते हुए उसके पास पहुची मैंने हाथ आगे बढ़ाया ही था को वो पलटी मैं सकपका गई मैंने कहा हेल्लो वो मुस्कुरा दी मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा are you alone here

 उसने ना मैं सिर हिलाया उसका चेहरा गोल और बहुत गोरा था, पर आँखे एकदम काली उसके बालो की तरह वो बेहद खूबसूरत थी. मैंने उससे पूछा where are you from इस बार वो धीमी आवाज मे बोली मैं भी भारतीय ही हु

 मैंने कहा ओह्ह्ह मुझे लगा आप विदेशी हो, वो हलके से हँस दी तभी मुझे ढूंढता हुआ विक्रम आ गया मैंने परिचय करवाया मैं रुबिन और मेरे हस्बैंड विक्रम मैं झूट बोल गई उसने अपना नाम सारा बताया !

 विक्रम ने चाय पीने का ऑफर दिया पर उसने मना कर दिया वो चोटि की और बढ़ चली जाते जाते विक्रम ने उसे be carefull कहा वो पलटी और मुस्कराते हुए हाथ हिला दिया

  हम लगभग २ घंटे वही बैठे रहे पर सारा वापिस नीचे की ओर नहीं आई मैंने कहा चलो बाजार घूम आते है पर विक्रम का मूड कुछ और था हम वापिस कॉटेज पहुचे वापसी के सारे रास्ते विक्रम शरारत करते हुए आया था

 कभी गले लगा लेता कभी चुम लेता कभी गोदी मैं उठा लेता मुझे लग रहा था काश यह वक़्त यही रुक जाये हम हमेशा यही रह जाए !,

 जब मेरी नींद खुली विक्रम बिस्तर पर नहीं था मैं कपडे पहनते हुए उसे आवाज देने लगी पर कोई जवाब नहीं आया विक्रम कही भी नहीं था तभी बाहर लॉबी मैं कुछ आवाज आई मैंने दरवाजा खोला

 तो विक्रम बाहर उस खिड़की के पास खड़ा था जहा मैंने सारा को पहली बार देखा था उसी तरह सर टिकाये हुए बाहर देखते हुए. जनाब कहा खो गए ?

 विक्रम पलटा, और बोला मुझे कोई उदास सी धुन सुनाई दी उसका पीछा करते करते यहाँ आ गया ! साथ वाले दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था, मुझे जिज्ञासा हुई, सारा वापिस आई के नहीं ?

 मैंने देखा तो रूम बिलकुल खाली था पलंग पर एक भी सिलवट नहीं परदे लगे हुए मुझे लगा सारा शायद चली गई!हमने decide किया आज डिनर खुद ही बनाएगे!

 विक्रम ने शिब्बू से चिकन और वोडका ले आने को कहा, हमने कॉटेज के आगण मे आग जलाई साइड मे ही चूल्हा मंगा लिया, वोडका देख शिब्बू भी हमारे साथ बैठ गया मैं चिकन पकाने लगी रात बढ़ती जा रही थी

  शिब्बू दो पेग लगाने के बाद सेंटी हो गया था कहने लगा, बाबु जी हमे भी दिल्ली ले चलो अपने पास रख लेना सेवा कर देगे. विक्रम उसे समझने लगा अरे तुम तो जन्नत मे रहते हो, यहाँ काम भी कम है

 आराम से रहो. आज तो कॉटेज मे हम अकेले ही गेस्ट है. शिब्बू ने कहा साहब पिछले कुछ महीनो से आप ही अकेले गेस्ट हो. मैं और विक्रम एक दूसरे की शक्ल देखने लगे, हमने कहा अच्छा एक कपल और भी था

 हमारे साथ वाले रूम मे आदमी को तो देखा नहीं, पर लड़की से मैं कॉटेज और फिर वाटर फॉल पर भी मिली, क्यों झूठ बोलते हो? शिब्बू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया वो कुछ नहीं बोला, विक्रम ने कहा क्या हुआ- शिब्बू अपना गला साफ़ करते हुए बोला, साहब मैं अपनी माँ की कसम खाता हु आप यहाँ अकेले ही गेस्ट हो आप आ गए नहीं तो मैं खुद अपने गांव जाना वाला था. मैंने कहा फिर वो लड़की कौन थी ?

 कहा से आई ? — शिब्बू ने बतया इस कॉटेज के बारे मे बहुत कहानिया फ़ैली हुई है, यह बहुत पहले अंग्रेजो के ज़माने मे किसी साहब बहादुर का घर था , और यहाँ कुछ मौते हुई थी

 तब से आस पास के लोग यहाँ आवाजे सुनने लगे, कभी कोई उदास सी धुन कभी लड़की के गाने की कभी रोने की, मेरा यह सुनकर खून जम गया था, पर शिब्बू हमें सांत्वना देते हुए बोला साहब मैंने तो आजतक ऐसा कुछ देखा ना सुना मैं तो रोज़ यही रहता हु कभी कुछ नहीं देखा!

 डिनर जैसे तैसे निपटा के हम दोनों रूम मे आ गए, विक्रम मुझे ढाढस बंधाते हुए बोला चरसी है कहा इस की बातो मैं आ रही हो, पर अंदर से वो भी डरा हुआ लग रहा था वोडका उतर चुकी थी

 और नींद भाग गई थी, मैं और विक्रम इधर उधर की बाते करते हुए टाइम बिता रहे थे रात के १० बज गए थे, बारिश शुरू हो गई, उसने माहौल को और बोझील बना दिया था बाते करते करते हम कब सो गए पता ही नहीं लगा!

 रात के किसी वक़्त मुझे लगा जैसे मेरे ऊपर कोई झुका हुआ है मैंने आँखे खोली तो सारा थी !सारा कंधो से पकड़ कर मुझे उठा रही थी मेरा नाम बार बार पुकार रही थी, उसकी आवाज किसी कुँए से आती हुई लग रही थी

  मैं हड़बड़ा कर उठी सारा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खिंचती हुई अपने साथ ले जाने लगी डर के मारे मेरे गले से आवाज तक नहीं निकल रही थी मैंने पीछे मुड़ कर देखा विक्रम बिस्तर पर ही था !

 सारा मुझें साथ वाले कमरे मे ले गई, उस कमरे की शक्ल ही बदली हुई थी, हॉल के कोने मे बड़ी सी चेयर पर एक अंग्रेज रोबीला सा आदमी बैठा हुआ वायलिन बजा रहा था

 उदास धुन, उसकी आँखे बंद थी सारा उसके पैरो के पास जा कर बैठ गई वो रोने लगी . सारा ने उसका हाथ अपने हाथ मे लिया और कहने लगी प्लीज अल्बर्ट डोंट गो डोंट लीव मी , पर उस आदमी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था,

 सारा का चेहरा लाल हो गया था, अचानक वो आदमी खड़ा हुआ, और मेरी ओर बढने लगा मैं जड़ थी जैसे मेरे आँखों के सामने कोई पिक्चर चल रही थी, तभी सारा के हाथ मे, ना जाने कहा से बन्दुक आ गई थी

 सारा फिर बोली अल्बर्ट स्टॉप. पर वो आदमी आगे बढ़ता ही जा रहा था. और फिर एक धमाका और ढेर सा धुँआ, और तब पहली बार मेरे गले से चीख निकली विक्रम और शिब्बू भागते हुए मेरे पास आये,

 मैं उस कमरे मैं जड़ खड़ी हुई थी और लगातार चीखे जा रही थी वहां कुछ भी नहीं था, विक्रम मुझे उठा कर अपने कमरे मे लाया, मुझे पानी पिलाया, मैं पसीने मैं भीगी हुई थी, वो बार बार मुझसे पूछ रहा था क्या हुआ?

 क्या हुआ? पर मैं कुछ बता नहीं पा रही थी, फिर कब मैं बेहोश हो गई पता नहीं लगा ! जब मेरी आँख खुली सवेरा हो गया था विक्रम परेशान सा मेरे सिरहाने बैठा हुआ था

 रूम के दूसरे कोने मैं शिब्बू दिवार से सर लगा कर ऊंघ रहा था, मैंने उठने की कोशिश की तो विक्रम ने मेरी मदद की ऐसा लग रहा था जैसे मैं सदियो से बीमार हु बहुत कमज़ोरी लग रही थी.

 शिब्बू को विक्रम ने काफ़ी बना कर लाने को कहा, फिर मुझे बाहों मे भरते हुए कहा क्या हुआ था ? रुबिन तुम रात को वहां क्यों चली गई थी ?

 मैंने सारी बात बता दी विक्रम सुन कर सन्न रह गया, उसने जैसे तैसे पैकिंग की मुझे सहारा दे कर तैयार करवाया और हम निकल पड़े कॉटेज से जैसे जैसे दूर जा रहे थे मेरे शरीर मे जैसे जान आती जा रही थी

 हम बाजार मे पहुच गए, विक्रम ने उस छोटे से ढाबे पर गाड़ी रोक दी वो बुड्डा चाय बना लाया विक्रम और मेरी सफ़ेद शक्ल देख कर वो बोला साहब हम तो पहले ही दिन आपको बताने वाले थे

 पर शहर के लोग ऐसे बातो को कहा मानते हो, फिर जो उसने कहानी सुनाई वो इस प्रकार थी-यह बात उस ज़माने की है, जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने वाले थे यह कॉटेज अंग्रेज अफसर अल्बर्ट केथ की थी

  उसकी फॅमिली इंग्लैंड में थी वो लगभग ४० साल का हट्टा कट्टा आदमी था, कुछ साल पहले वो बंगाल से एक एंग्लोइण्डियन लड़की सारा को अपने साथ ले आया था, वो बेचारी उससे बहुत प्यार करती थी

 पर जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने लगे तो अल्बर्ट सारा को छोड कर जाने लगा उसे वो साथ कैसे ले जाता इंग्लैंड मैं उसकी बीवी और ४ बच्चे थे !

 सारा सारी जिन्दगी जिसे प्यार समझ रही थी वो तो बस मन बहलाव था, उसने बहुत कोशिश की अल्बर्ट ना जाये पर वो ना माना और फिर सारा ने उसे गोली मार दी और खुद वॉटरफॉल से छलाँग मार कर आत्महत्या कर ली। तब से ही उनकी आत्मा भटक रही है !

 मैं सारे रास्ते यही सोचती हुई आई की, क्यों सारा ने मुझे चुना क्या वो कुछ बताना चाहती थी, मुझे इशारा करना चाहती थी ?

 जब गुडगाँव करीब आने लगा तो मैंने विक्रम को कहा क्या तुम भी मुझे छोड़ तो नहीं जाओगे हमारे रिश्ते का भी तो कोई नाम नहीं विक्रम मेरी और हैरानी से देखने लगा वो कुछ नहीं बोला

 जिंदगी वापिस आ कर फिर बिजी हो गई एक शाम मेरा फ़ोन बजा – हेल्लो जानेमन रेडी हो जाओ मम्मी पापा आ रहे है

 उलझे बालो वाली लड़की ने मेरी जिंदगी सुलझा दी थी Horror Story

8. माँ की ममता – Bhoot ki kahani

वैभव जो 26 साल का है उसकी अभी अभी नयी शादी हुई है और उसकी एक खूबसूरत सी बीवी भी है। ,

 ये दोनों हनीमून बनाने हिमाचल गए थे जहाँ उन्होंने 4 दिन गुजारे। अब उनके दिल्ली अपने घर वापस आने का समय हो गया था। दोनों अपनी गाड़ी में बैठ गए और दिल्ली के लिए चल दिए।

 रात के 11 बज गए थे अब वो हिमाचल की घाटी को पार करने ही वाले थे। रोड बिलकुल सुनसान थी और गाडी बिलकुल तेज़ी में जा रही थी ।,

 अचानक वैभव को अपनी गाड़ी के आगे एक औरत दिखी जिसने लाल रंग की साड़ी पहनी थी। वो दूर से ही हाथ हिला कर गाडी को रोक रही थी।

  उसको देख कर वैभव की बीवी ने उसे गाडी रोकने से मना कर दिया क्योंकि उसको डर था की ये कोई लूट पाट करने की चाल हो सकती है।

 लेकिन वो औरत गाड़ी के सामने आगई जिससे वैभव को गाडी रोकनी पड़ी। वो औरत ज़ोर ज़ोर से दरवाज़े को पीटने लगी उसके चेहरे के हाव भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी बड़ी मुसीबत में हो।,

  वैभव की बीवी ने उसे गाडी का दरवाज़ खोलने से मना कर दिया उसने कहा कि ये कोई चाल हो सकती है हमें बहार नहीं जाना चाहिए ।

 पर वैभव ने बोला की अगर सच में ये किसी मुसीबत में होगी तो और उसे हमारी जरुरत हो क्योंकि उसको देख कर वो अच्छे खासे घर की लग रही थी। ये बोलते ही वैभव ने गाडी का दरवाज़ा खोल दिया और बाहर आ गया।

 वो औरत घबराते हुए बोली ” प्लीज, मेरी मदद करो “। वैभव ने बोला क्या हुआ है।उस औरत ने जवाब दिया की ” मेरी गाड़ी नीचे खाई में गिर कर एक पेड़ से टकरा गई है और उसमें मेरी छोटी सी बच्ची फसी हुई है। प्लीज उसको बाहर निकालो ” ,

 ये सुनते ही वैभव की बीवी भी बाहर आगई और तीनों खाई की और भागे। उन्होंने देखा की वो गाडी थोड़ी नीचे एक पेड़ से टकराई हुई है। वैभव झट से नीचे की और गया। उसने देखा की पीछे वाली सीट पर एक बच्ची बैठी है

 जो रो रही है। वैभव ने दरवाज़ा खोलना चाहा पर वो नहीं खुला। दरवाज़ा अटका हुआ था। उसने बोहोत कोशिश की तब जा कर वो दरवाज़ा खुला। वैभव ने उस लड़की को बहार निकाल कर अपनी गोदी में रख लिया।

 पर लड़की अभी भी रोए जा रही थी और मम्मी मम्मी कर रहा थी। तभी वैभव की नज़र आगे वाली ड्राइविंग सीट पर गयी जहाँ उसे कोई बैठा हुआ लगा। लेकिन आगे वाली गाडी का शीशा धुंधला था तो साफ़ नज़र नहीं आरहा था।

 उसने अपने कपडे से उसे साफ़ किया । और जो वैभव ने देखा उसे देख कर उसकी पैरो तले ज़मीन ही खिसक गई। उसको विश्वास ही नहीं हो रहा था। ,

 उसने देखा की आगे वाली सीट पर और कोई नहीं उस बच्ची की माँ थी जो मदद के लिए वैभव को बुला रही थी। उसने देखा की वो औरत के माथे से खून निकल रहा है और उसकी मौत हो चुकी है।

 वैभव की पत्नी ने वैभव की हालत देख कर झट से उसके पास आई और वो भी ये मंजर देख कर हैरान हो गयी ।ये देखते ही वैभव और उसकी पत्नी ने पीछे की और देखा जहाँ वो औरत खड़ी थी पर वहाँ अब कोई नहीं था। Horror Story in Hindi

9. खजाने की आत्मा अपने वारिस की तलाश कर रही है – Bhuto ki kahani

हम आपको ऐसी ही एक घटना से परिचित करवाने जा रहे हैं जिसके पीछे क्या कारण है यह तो नहीं पता लेकिन गांव के लोग इसे अपने पूर्वजों की आत्मा से जुड़ा राज मान रहे हैं.

गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के पास एक छोटा सा गांव है. इस गांव की लगभग 5 एकड़ जमीन पूरी तरह खाली पड़ी है. लेकिन उल्लेखनीय बात यह है कि यह जमीन पिछले कई दशकों से खाली पड़ी है क्योंकि यहां जो पेड़ थे वह भी या तो गिर गए या फिर कटवा दिए गए. इस जमीन पर कहा जाता है दो बड़ी-बड़ी हांडियां घूमती रहती हैं. दो हांडिया जिनका मुंह एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और वह इस जुड़े हुए मुंह के साथ पूरी जमीन का चक्कर लगाती हैं. जो भी उन हांडियों को पकड़ने की कोशिश करता है उसे असफलता ही हाथ लगती है. वह किसी के हाथ नहीं आतीं और कहां छिप जाती हैं यह कोई नहीं जानता.

अब आप सोच रहे होंगे कि या तो यह कहानी मनगढ़ंत है या तो इसके पीछे कोई गहरा राज है. जी हां, इन हांडियों के वहां विचरण करने के पीछे एक गहरा राज है और गांव वालों के अनुसार वह राज है धन-दौलत.

गांव वालों का कहना है कि एक विशिष्ट परिवार के छिपे हुए खजाने की रक्षा करने के लिए ही यह हांडिया उस जमीन पर घूमती हैं. ऐसी मान्यता है कि अगर कोई वस्तु एक लंबे समय तक जमीन में गड़ी रहती है तो उसमें जान आ जाती है और ऐसा ही कुछ हुआ इन हांडियों के साथ. पहले के जमाने में जब ना तो बैंक हुआ करते थे और ना ही कोई लॉकर तो परिवार के लोग अपनी धन-दौलत को जमीन में गाड़ देते थे. काफी समय तक जमीन में गड़े इस खजाने की जब किसी ने खोज खबर नहीं ली तो वह खजाना जीवित हो उठा और उस जमीन पर भ्रमण करने लगा.

अब आप यह भी सोच रहे होंगे कि इतना बड़ा खजाना होने के बावजूद क्या किसी ने उन हांडियों को पकड़ने की कोशिश नहीं की? तो इस सवाल का जवाब हम आपको देते हैं कि कोशिश तो की लेकिन वह हांडिया किसी के हाथ आने के लिए तैयार नहीं हैं. कहते हैं इन हांडियों में उस परिवार के पूर्वजों की आत्मा है और वह जिसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करेंगे उसे ही वह खजाना सौंपेंगे और अगर किसी ने जबरन उन हांडियों को पकड़ने की कोशिश की तो इससे जान का खतरा भी हो सकता है.

अभी तक उस परिवार की सभी पीढ़ियां इस खजाने को पाने के लिए हांडियों को काबू में करने की कोशिश कर चुकी हैं लेकिन किसी को सफलता हासिल नहीं हुई है. I Horror Story in Hindi

10. भटकती रूह की सच्ची कहानी – Horror Story in Hindi

भूत-प्रेत के किस्से सुनने में बेहद रोमांचक और दिलचस्प लगते हैं लेकिन क्या हो जब यह किस्से सिर्फ किस्से ना रहकर एक हकीकत की तरह आपके सामने आएं? आज की युवा पीढ़ी भूत और आत्माओं के होने पर विश्वास नहीं करती लेकिन जिस पर आप विश्वास नहीं करते वह असल में है ही नहीं यह तो संभव नहीं है ना. आज हम ऐसे ही भूतहा स्थान से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं एक आत्मा ने किया था.

जोधपुर (राजस्थान) स्थित बावड़ियों के किस्से स्थानीय लोगों में बहुत मशहूर हैं. यहां पानी की कई बावड़ियां हैं जिनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि उसे भूत ने बनवाया था.

जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित ‘रठासी’ नाम का एक ऐतिहासिक गांव है. मारवाड़ के इतिहास पर नजर डालें तो यह ज्ञात होता है कि जब जोधपुर में रहने वाले राजपूतों की चम्पावत शाखा का विभाजन हुआ तो उनमें से अलग हुए एक दल ने कापरडा गांव में रहना शुरू किया. लेकिन इस स्थान पर रहने वाले युवा राजपूत राजकुमारों ने गांव में साधना करने वाले साधु-महात्माओं को परेशान करना शुरू कर दिया. उन राजकुमारों से क्रोधित होकर साधुओं ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके आने वाली पीढ़ी इस गांव में नहीं रह पाएगी.

साधुओं के श्राप की बात जब राजकुमारों ने अपने घर में बताई तो सभी भयभीत हो गए और उस गांव को छोड़कर चले गए. इस गांव को छोड़कर वह जिस गांव में रहने के लिए गए उस गांव का का नाम है रठासी गांव. यह जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक गांव है.

इस गांव में एक बावड़ी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भूतों के सहयोग से बनी है अर्थात उस बावड़ी को बनाने में भूत-प्रेतों ने गांव वालों की सहायता की थी. ठाकुर जयसिंह के महल में स्थित इस बावड़ी को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं. इस बावड़ी के विषय में यह कहानी प्रचलित है कि एक बार जब ठाकुर जयसिंह घोड़े पर सवार होकर जोधपुर से रठासी गांव की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ठाकुर साहब का घोड़ा उनके साथ-साथ चलने वाले सेवकों से पीछे छूट गया और इतने में रात हो गई.

राजा का घोड़ा काफी थक चुका था और उसे बहुत प्यास लगी थी. रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए ले गए. आधी रात का समय था घोड़ा जैसे ही आगे बढ़ा राजा को एक आकृति दिखाई दी जिसने धीरे-धीरे इंसानी शरीर धारण कर लिया. राजा उसे देखकर डर गया, उस प्रेत ने राजा को कहा कि मुझे प्यास लगी है लेकिन श्राप के कारण मैं इस कुएं का पानी नहीं पी सकता. राजा ने उस प्रेत को पानी पिलाया और राजा की दयालुता देखकर प्रेत ने उसे कहा कि वह जो भी मांगेगा वह उसे पूरी कर देगा.

राजा ने प्रेत को कहा कि वह उसके महल में एक बावड़ी का निर्माण करे और उसके राज्य को सुंदर बना दे. भूत ने राजा के आदेश को स्वीकारते हुए कहा कि वो ये कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा, लेकिन दिनभर में जितना भी काम होगा वह रात के समय 100 गुना और बढ़ जाएगा. उस प्रेत ने राजा को यह राज किसी को ना बताने के लिए कहा. इस घटना के दो दिन बाद ही महल और बावड़ी की इमारतें बनने लगीं. रात में पत्थर ठोंकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण काम तेज गति से बढ़ने लगा. लेकिन रानी के जिद करने पर राजा ने यह राज रानी को बता दिया कि आखिर निर्माण इतनी जल्दी कैसे पूरा होता जा रहा है. राजा ने जैसे ही यह राज रानी को बताया सारा काम वहीं रुक गया. बावड़ी भी ज्यों की त्यों ही रह गई. इस घटना के बाद किसी ने भी उस बावड़ी को बनाने की कोशिश नहीं की. Horror Story in Hindi

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